स्त्री मन

क्या पढ़ पाओगे?
क्यों किसी के छोड़कर
जाने की सोच कर ही
सिहर उठता है मन?
क्या इतना ही कमजोर होता है
एक स्त्री मन?

किसी के चले जाने के
अहसास भर से ही
काँप उठता है
कुंदन सा तपा हुआ तन,
मानो भूगर्भीय हलचल से
कंपकंपा उठी हो धरती।

एकाकी पाती है स्वयं को
नितांत भरी भीड़ में भी,
खामोशियों का
ओढ़कर आवरण
सी कर अधरों को
काट लेती है सारी उम्र,
जीवित रखती है स्वयं को—
अपने लिए नहीं,
अपनों के लिए।

हाँ, वह स्त्री ही है जो
असंभव को संभव कर देती है।
छली जाने पर भी
अंजुरी भर कर दुआएँ देती हैं।

निरुपमासिंह, प्रसिद्ध साहित्यकार, बिजनौर

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