बिदा हो गए हैं वो हमसे
जिनसे हमारी पहचान है
नमन सदा उन पितरों को
जिनकी हम संतान हैं
जाते कहीं नहीं वो दूर हमसे
रहते हैं हर पल वो संग हमारे
पितृपक्ष तो अवसर है सिर्फ
याद उन्हें करने का
रोज़ नज़र आते हैं वो
घर के हर एक कोने में
घर की देहरी हो
या हो घर का आँगन
रहते हैं वो अहसासों में
दे जाते हैं संस्कार वो अपने
अपनी आने वाली पीढ़ी को
छोड़ जाते हैं वो अपने
हावभाव और चाल-ढाल
अपनी भावी पीढ़ी में
आती है हर पल उनकी याद
उनकी अनमोल धरोहर से
खास है वो अनमोल घरौंदा
जो सींचा था उन्होंने तन-मन से
रह जाता है सिर्फ़ यादों में
बगीचे का वो खाली कोना
आती है बस याद यही
पसंद-नापसंद सब उनकी
जीवित रहती हैं यादें उनकी
पीढ़ी दर पीढ़ी तक
पितृपक्ष तो एक अवसर है
याद उन्हें करने को
देते हैं वो आशीष हमें
हर पल खुशहाली का
नमन सदा उन पितरों को
जो आज हमारे साथ नहीं

संध्या श्रीवास्तव, प्रसिद्ध कवयित्री, लखनऊ