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पितृपक्ष

पितृपक्ष का यह सोलह दिवसों का पर्व पूर्वजों की स्मृति और श्रद्धा का विशेष समय है। श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान से पितर प्रसन्न होकर आशीर्वाद देते हैं। वेद, उपनिषद और गीता में भी यही बताया गया है कि आत्मा अजर-अमर है और श्राद्ध से हमें पुण्य मिलता है। कौए और गौ सेवा का विधान पितृपक्ष को और भी पावन बना देता है।

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नमन उन पितरों को, जिनसे है हमारी पहचान

पितृपक्ष केवल स्मरण का पर्व नहीं, बल्कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित रहने वाले संस्कारों और धरोहरों का अनुभव है। पितर कहीं दूर नहीं जाते, वे हर आँगन, हर देहरी और हमारे हावभाव तक में बसे रहते हैं। उनकी दी हुई सीख और आशीष ही हमें जीवनभर संबल देती है और हमारी पहचान को सहेजती है।

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