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इंतजार में अमृता प्रीतम…

सोचती हूं उन्हें तो, यह खयाल आता है अंतर्मन में कि,

 काश! मैं भी होती अमृता प्रीतम तो, क्या कोई साहिर मिलता!

यदि साहिर सा कोई मिल भी जाता तो क्या मैं, अमृता बन पाती जो, 

सिगरेट की बुझी राख प्रेम की चाशनी की चुस्कियां लेकर तृप्त हो पाती…!

यदि साहिर मेरे होते,

पूरे गीत रच डालते सिर्फ और सिर्फ अपनी अमृता के लिए तो क्या अमृता मैं न बन जाती!

साहिर जिन्होंने, कभी ठीक से जताया नहीं दुनिया को,बताया नहीं,

पर अमृता ने महसूस तो किया होगा उस अल्हड़ प्रेम को…!

कैसे इतना निःस्वार्थ प्रेम को जीया दोनों ने हक जताए बगैर!

तभी तो, इमरोज़ ने संभाला अमृता को बगैर जमाने की परवाह किए…!

किया इमरोज़ ने निःस्वार्थ प्रेम अमृता को,

हर लम्हा हर पल साथ निभाया… जबकि, उन्हें पता था अमृता पहले से प्रेम में हैं!

क्या फर्क पड़ता है कौन किसके प्रेम में है…?

जब प्रेम होता है तो वो सिर्फ और सिर्फ प्रेम होता है!

पीठ पर साहिर लिखा अमृता ने तो, क्या मैं लिख पाऊंगी अपने साहिर को मुझे, इमरोज़ कोई मिल पाएगा…?

कहां होता है ऐसा दुर्लभ प्रेम,कहां मिलते हैं साहिर और इमरोज़…?

कैसे बनूं मैं अमृता प्रीतम जो,

 प्रेम का अथाह सागर लेकर भी प्रेम विहीन है…!

न तन्हाई का साथी इमरोज़ यहां हैं न, अमृता को लिखने वाले साहिर…!

परंतु,आज भी अमृता जीवित है इंतजार में…!!

डॉ. निवेदिता श्रीवास्तव, गार्गी, प्रसिद्ध लेखिका, जमशेदपुर

4 thoughts on “इंतजार में अमृता प्रीतम…

    1. मानव मन के मन्थन को समझना बहुत कठिन काम है । अपने लेखन की सच्चाई को जग ज़ाहिर कर , साहिर और अमृता जी , दोनो ने समाज को नकार कर अपना जीवन जिया । इमरोज ने दोस्ती को बहुत ऊंचाई पर पहुंचा दिया , बिना कोई शिकायत किए और प्रेम की पराकाष्ठा को परिभाषित किया ।
      धन्य थे ये सभी , जीवित पात्र , अपनी कहानियों में जीने वाले ।

  1. मानव मन के मन्थन को समझना बहुत कठिन काम है । अपने लेखन की सच्चाई को जग ज़ाहिर कर , साहिर और अमृता जी , दोनो ने समाज को नकार कर अपना जीवन जिया । इमरोज ने दोस्ती को बहुत ऊंचाई पर पहुंचा दिया , बिना कोई शिकायत किए और प्रेम की पराकाष्ठा को परिभाषित किया ।
    धन्य थे ये सभी , जीवित पात्र , अपनी कहानियों में जीने वाले ।

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