तुम “तारा” हो
तुम मेरे आकाशगंगा का तारा हो—जो मेरे ख्वाहिशों के लिए टूटने को तैयार रहती हो, अपनी खुशियों, समय और संसाधनों को बटोरकर भी प्रकाश फैलाती रहती हो। तुम मुझे सपने सच करने का साहस देती हो और सिखाती हो कि दूसरों के लिए भी तारा बनना संभव है।

तुम मेरे आकाशगंगा का तारा हो—जो मेरे ख्वाहिशों के लिए टूटने को तैयार रहती हो, अपनी खुशियों, समय और संसाधनों को बटोरकर भी प्रकाश फैलाती रहती हो। तुम मुझे सपने सच करने का साहस देती हो और सिखाती हो कि दूसरों के लिए भी तारा बनना संभव है।
यह रचना अमृता प्रीतम, साहिर और इमरोज़ की अमर प्रेमकथा की संवेदनाओं को छूती है। लेखिका के अंतर्मन में यह प्रश्न उठता है कि क्या स्वयं वह अमृता जैसी हो सकती है, जिसे साहिर का अल्हड़ किन्तु अनकहा प्रेम मिला और इमरोज़ का निःस्वार्थ साथ। प्रेम की यह त्रयी—अनकहे भाव, निस्वार्थ समर्पण और अनंत प्रतीक्षा—मानव हृदय के उस गूढ़ कोने को उजागर करती है जहाँ प्रेम अपनी सीमाओं और परिभाषाओं से परे जाकर केवल “होने” में अर्थ पाता है। यही सोच अमृता को कालजयी बनाती है और यही प्रश्न आधुनिक मन को बेचैन करता है—क्या अब भी ऐसा दुर्लभ प्रेम संभव है?