झुग्गी-झोपड़ी में शिक्षा का अलख जगाने का हमारा मिशन पूरे जोरों पर था । नन्हें मुन्नों को देने के लिए कुछ चॉक-स्लेट और बिस्कुट लेकर मैं घर से निकल पड़ा । घर से निकलते हुये मेरे अधरों पर प्रसन्नता की स्मित खिची हुई थी। बात ही ऐसी थी। कल मेरे अग्रज द्वारा आयोजित बन्द पूरी तरह सफल रहा था। होता भी क्यों नहीं आखिर वे जनप्रिय नेता थे। आज के सारे अखबार इसी खबर से रंगे हुये थे। घर में सुबह से यही चर्चा थी।
झुग्गी-झोपड़ी के अपने क्षेत्र में पहुँचते ही
नन्हे ननकू पर मेरी नजर ठहर गयी। जो टुकुर-टुकुर सूनी सड़क को निहार रहा था ।
‘‘अरे ननकू वहॉं क्या देख रहे थे? चलो, पढ़ाई का समय हो गया है ।’’
‘‘हमका भूख लागल बा।” बिना नजर घुमाये ननकू बोला ।
‘‘आधा दिन बीत गया, तुमने अभी कुछ खाया नहीं?” आश्चर्य मेरे स्वर में उतर आया ।
ननकू के स्थान पर पास बैठे एक बुजुर्ग बोले, ‘‘बच्चन का पढ़ावे का काम सोझो बा बिटवा। जिन्दगी के पढ़ना बड़ों गूढ़ बा।’’
‘‘मैं समझा नहीं बाबा।’’
‘‘काहे बूझोगे बचवा, पर हमार लड़िकन का बन्द का मतलब बताये का न पड़ी। ऊ तो ‘‘बन्द’’ के नाम से जान जात हैं कि घर का चूल्हा बन्द।’’
मैं विस्फारित नजरों से ननकू को देखने लगा। जो हमारी बातों से अनजान भूखे पेट और आशा भरी नजरों से अपलक सड़क को निहार रहा था। जहॉं से उसका बापू रोटी लेकर आने वाला था।
बन्द का यह अर्थ मैंने आज जाना था।

नीलम राकेश, सीतापुर रोड, लखनऊ उत्तर-प्रदेश
प्रकाशन हेतु धन्यवाद
” कोविड ” के समय सभी दैनिक मजदूरों का हाल बड़े समय तक चलने वाले ” बन्द ” से बुरी तरह प्रभावित हुआ। शहर में रहने का किराया बहुतों ने टोलियों में रहकर दिया पर रोज़ खाने की जरूरत पूरी नहीं कर पाने के कारण , उन्हें वापस अपने गांवों को प्रस्थान करना पड़ा।
इनकी कठिनाई एक बच्चे की नहीं , देश भर के लाखों परिवारों की थी। बन्द खुलने के बहुत समय के बाद तक ये दुबारा शहरों में आकर बसे ।
प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक धन्यवाद