बन्द
झुग्गी-झोपड़ी में शिक्षा का दीप जगाने का हमारा छोटा-सा मिशन पूरे जोश में था। नन्हे-मुन्नों के लिए चॉक-स्लेट और कुछ बिस्कुट लेकर मैं घर से निकला तो चेहरे पर मुस्कान तैर रही थी। कारण भी था—कल मेरे अग्रज द्वारा आयोजित बन्द पूरी तरह सफल रहा था। अख़बारों के पन्ने उसी खबर से सजे थे और घर का माहौल सुबह से उसी चर्चा में डूबा था।
अपने परिचित क्षेत्र में पहुँचा तो नज़र नन्हें ननकू पर टिक गई। वह सूनी सड़क को टकटकी लगाए देखे जा रहा था।
“अरे ननकू! क्या देख रहे हो? चलो, पढ़ाई का समय हो गया है।” मैंने पुकारा।ननकू ने बिना आँखें हटाए धीमे स्वर में कहा—
“हमका भूख लागल बा।”
