राखी के धागों में उलझा बाज़ार और बदलते रिश्तों का रंग

स्नेह के धागों से सिक्त भाई-बहन के बीच अटूट प्रेम का उत्सव है रक्षाबंधन। पर जिस तरह हर त्योहार बाज़ारवाद की भेंट चढ़ता जा रहा है, वहीं रक्षाबंधन का यह पावन पर्व भी इससे अछूता नहीं रह गया। शायद यही कारण है कि आज त्योहार मनाने से पहले हर किसी को अपनी जेब टटोलनी पड़ती है। आखिर, बाज़ार की चमक-दमक और महंगे से महंगे तोहफ़े खरीदने की होड़ ने आम आदमी के हृदय में उपजने वाली उत्सव की सहज भावनाओं को कहीं न कहीं दबा दिया है।

हाँ, मुझे आज भी याद है — बचपन की राखी, जब सारे भाई-बहन, चाचा-बुआ, भतीजे-भांजे, अपार स्नेह लिए घर के बड़े-बुज़ुर्गों संग इस पवित्र त्योहार को मधुरता से मनाते थे। न महंगे लिबास पहनने की होड़ थी, न ही तोहफ़े पाने का लालच। बस तिलक, रोली, नारियल, मिठाई और एक बड़ी-सी स्पंज लगी राखी बांधकर भाई अपनी बहन की रक्षा और सौभाग्य की कामना करते थे। बहनें भी बिना किसी अपेक्षा के मायके और भाई के स्वास्थ्य व समृद्धि की मनोकामना लिए ईश्वर से प्रार्थना करती थीं।

वर्तमान में त्योहार वही है, रक्षाबंधन की पवित्रता भी वही है, पर लगता है कि बाज़ार में उपलब्ध राखी के धागों के छोटे और चमकदार होने के साथ-साथ रिश्ते भी सिकुड़ गए हैं — जैसे इनके मध्य का निस्वार्थ स्नेह भी अपनी परिधि खो चुका हो। अब अहं की भावना, जलन, एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ और अपनों के बीच उपजते उपेक्षा के भावों ने रिश्तों और त्योहार के सुंदर स्वरूप को कहीं न कहीं विकृत कर दिया है।

शैली भागवत ‘आस’ शिक्षिका, लेखिका
इंदौर (म. प्र.)

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