आधुनिकता
ज़ीरो नाइट
हर साल शहरों के होटलों में ज़ीरो नाइट भव्यता से मनाई जाती है, लेकिन इस बार युवा लड़कियों ने नशे में अपनी मर्यादा खो दी। नशे और तेज़ गाड़ी के कारण कई दुर्घटनाएँ हुईं, जिनमें परिवारों की खुशियाँ भी मिट गईं। यह घटनाएँ समाज और संस्कृति पर प्रश्न खड़े करती हैं।
वो गाँव की कच्ची सड़क…
गाँव के बदलते स्वरूप और उसमें आने वाले शहरीकरण की भावनात्मक तस्वीर पेश करती है। कच्ची सड़कें अब काली, चौड़ी और बदल चुकी हैं, दोनों तरफ हरियाली से लहलहाते खेत अब दुकानों और व्यावसायिक स्थलों में बदल गए हैं। गाँव के लोग और उनकी सरल जीवनशैली धीरे-धीरे शहरी अंदाज़ और मुखौटे में बदल रही है। सुनार की जगह ज्वैलर्स, भड़भूजे और चने की जगह पॉपकॉर्न जैसी चीजें गाँव में जगह लेने लगी हैं। जबकि यह विकास और सुविधा का प्रतीक है, कवि अपने पुराने प्यार और ग्रामीण सादगी को याद करता है और मन में कचोट अनुभव करता है।
राखी के धागों में उलझा बाज़ार और बदलते रिश्तों का रंग
स्नेह के धागों से सिक्त भाई-बहन के बीच अटूट प्रेम का उत्सव है रक्षाबंधन। पर जिस तरह हर त्योहार बाज़ारवाद की भेंट चढ़ता जा रहा है, वहीं रक्षाबंधन का यह पावन पर्व भी इससे अछूता नहीं रह गया। शायद यही कारण है कि आज त्योहार मनाने से पहले हर किसी को अपनी जेब टटोलनी पड़ती है। आखिर, बाज़ार की चमक-दमक और महंगे से महंगे तोहफ़े खरीदने की होड़ ने आम आदमी के हृदय में उपजने वाली उत्सव की सहज भावनाओं को कहीं न कहीं दबा दिया है।
दोगले दिखावे में डूबी सभ्यता
इस व्यंग्यात्मक कविता में आधुनिक सभ्यता पर तीखा प्रहार किया गया है, जहाँ दिखावे की चकाचौंध में इंसान की असली पहचान खोती जा रही है। हर वर्ग, हर उम्र इस बनावटी संस्कृति की चपेट में है — चाहे वह भाषा हो, पहनावा हो, या जीवनशैली। ‘दाढ़ी पेट में है’ जैसे प्रतीकों के ज़रिए लेखक ने दिखावे की भूख को उजागर किया है, वहीं ‘चंगू जी बिक गए’ जैसे कटाक्षों से सामाजिक मूल्यों के पतन की ओर इशारा किया गया है। यह अंश समाज की दोहरी मानसिकता, भाषा के घमंड और आत्मकेंद्रित प्रवृत्तियों की एक झलक पेश करता है — जहाँ आंतरिक मूल्य गौण हो गए हैं और बाहरी प्रदर्शन ही सब कुछ बन गया है।
