तुलसीदास: एक ताने ने जिसे बना दिया युगों का संत

भारत की सांस्कृतिक और धार्मिक चेतना में जब भी भक्ति और आध्यात्मिक साहित्य की बात होती है, गोस्वामी तुलसीदास का नाम श्रद्धा और गौरव के साथ लिया जाता है. वे न केवल एक संत, एक कवि और एक भक्त थे, बल्कि आध्यात्मिक क्षेत्र के ऐसे युगपुरुष भी थे जिन्होंने अपनी रचनाओं से भारतीय समाज की आत्मा को गहराई से स्पर्श किया.
लगभग 500 वर्ष पूर्व भारत में मुगल शासन की नींव पड़ चुकी थी. इसी काल में उत्तरप्रदेश के बांदा ज़िले के ग्राम राजापुर में रामबोला नामक बालक का जन्म हुआ. जन्म के समय ही उन्हें अमंगलकारी मानकर माता-पिता ने त्याग दिया. मां का देहांत हो गया और एक दासी चुनियां ने उन्हें पाल-पोसकर बड़ा किया. लेकिन दुर्भाग्यवश साढ़े पांच वर्ष की आयु में वह भी चल बसीं. अनाथ रामबोला को फिर संत नरहरिदास ने अपनाया और उन्हें शिक्षित-दीक्षित किया.
पत्नी की बात ने बदला जीवन
युवा होकर रामबोला विवाह सूत्र में बंधे. वे अपनी पत्नी रत्नावली से अत्यंत प्रेम करते थे. लेकिन एक दिन रत्नावली के द्वारा दिया गया एक व्यंग्यात्मक वाक्य लाज न आवत आपको, धरे देव की माया, अस्थि चर्म ममता रचि, मोह भया भुलाया उनके जीवन का निर्णायक मोड़ बन गया. यह ताना आत्मा को झकझोर गया. उन्होंने सांसारिक जीवन त्याग दिया और रामभक्ति के पथ पर अग्रसर होकर तुलसीदास बन गए. उस समय भारत में भक्ति आंदोलन की धारा बह रही थी. सूरदास, रैदास, मीरा बाई जैसे संत अपने काव्य और संगीत से लोगों को धर्म की ओर प्रेरित कर रहे थे. तुलसीदास ने रामकथा को माध्यम बनाकर सनातन धर्म की भावना को पुनः जाग्रत किया. उन्होंने अनेक तीर्थों का भ्रमण कर समाज को जागरूक किया. परंतु उनका सबसे बड़ा योगदान रहा श्रीरामचरितमानस.
रामचरितमानस नैतिक मूल्यों का समग्र दस्तावेज
संस्कृत भाषा में लिखे वेद और पुराण आम जन के लिए कठिन थे. तुलसीदास जी ने उस गूढ़ ज्ञान को अवधी जैसी लोकभाषा में ढालकर जनसामान्य के लिए सुलभ बना दिया. रामचरितमानस केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं है, बल्कि वह सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक और नैतिक मूल्यों का समग्र दस्तावेज है. उसमें नीतिशास्त्र, मनोविज्ञान, लोकजीवन, जीवनशैली, दार्शनिक चिंतन सब कुछ समाहित है. मानस की लोकप्रियता का यह आलम है कि आज भी ग्रामीण भारत के किसान और मजदूर इसकी चौपाइयों को उद्धृत करते मिल जाते हैं. जैसे
कोउ नृप होय हमहिं का हानी, चेरी छोड़ न होउब रानी
का बरसा जब कृषि सुखाने, समय चुकें पुनि का पछताने
पर उपदेस कुसल बहुतेरे, जे आचरहिं ते नर न घनेरे
तुलसीदास जी केवल लेखक नहीं थे. उन्होंने मानस का लोकमंचन और प्रवचन आरंभ किया, जिससे आधुनिक रामलीला और कथा-वाचन परंपरा की शुरुआत हुई. यही कारण है कि वे धार्मिक साहित्य के क्षेत्र में क्रांति लाने वाले युगपुरुष कहे जाते हैं.
गोस्वामी तुलसीदास का जीवन एक तपस्या था, एक मिशन था. उनका साहित्य अमर है, और उनकी आत्मा आज भी ङ्गमानसफ की चौपाइयों के माध्यम से जीवंत है. उन्होंने कलियुग के अंधकार में रामभक्ति की जो लौ जलाई, वह आज भी जनमानस को आलोकित कर रही है.

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