अंदर की चीख़ें: मुस्कुराते चेहरे के पीछे का तूफ़ान

जब ज़माना हँसी के सिवा कुछ नहीं देखता है,

सच हर किसी से छुपा है, कोई नहीं देखता है।

जो मुखौटा पहन कर जिऊँ, सबको लगता है ठीक हूँ,

जो मुझे रात-भर झकझोरता है, कोई नहीं देखता है।

झुकती हूँ हर इक मोड़ पर, फिर भी कभी टूटी नहीं,

ये जो अंदर का हौसला है, कोई नहीं देखता है।

वो जो मुझसे सवाल करता क्या अब भी ख़्वाब हैं बचे?

रोज़मर्रा में क्या खो गया है, कोई नहीं देखता है।

दरारों में छुपा रखे हैं किस्से, ज़माने भर से छुपाकर,

जो दर्द मुझको तोड़ता है, कोई नहीं देखता है।

बारिशों में जो नाचती थी, वो लड़की अब चुपचाप है,

भीगती है दर्द में आज भी, कोई नहीं देखता है।

अब ख़ामोशी से चलती हूँ, बनावटों से दूर दूर,

दिल में है जो तूफ़ान सा, कोई नहीं देखता है।

सिर्फ़ रौशनी ही दवा नहीं है, कुछ अंधेरे भी हैं शरीक,

रात में जो मुझको थामता है, कोई नहीं देखता है।

अब भी खुद को ढूँढ़ती हूँ, मोहब्बत सी हो चली,

जो मैं बन सकती हूँ कल को, कोई नहीं देखता है।

गरिमा भाटी “गौरी” फ़रीदाबाद, हरियाणा।

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