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रिश्तों को तह करती औरत

औरत हर दिन अपने रिश्तों को ऐसे तह करती है जैसे बिस्तर पर फैले कपड़े। शिकायतों की सलवटें मोड़कर छुपा देती है, बेरुख़ी को मुस्कान के पल्लू में ढँक लेती है। आँसुओं में धोकर, सहनशीलता की धूप में सुखाए इन रिश्तों को वह अपनी आत्मा के धागों से सीती रहती है। कुछ रिश्ते पुराने कुरतों जैसे ढीले हो चुके हैं, कुछ दुपट्टों जैसे बार-बार फिसलते हैं—फिर भी वह संभालती जाती है। लेकिन रात के सन्नाटे में उसके मन में एक सवाल उभरता है—क्या कभी कोई उसे भी इसी तरह तह करके सँभाले रखता होगा, या वह खुद ही वह अलमारी है, जिसमें सब रखा जाता है, पर कोई कभी खोलकर नहीं देखता।

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अंदर की चीख़ें: मुस्कुराते चेहरे के पीछे का तूफ़ान

यह कविता एक ऐसी संवेदनशील आत्मा की आवाज़ है जो दुनियावी दिखावे और भीड़ की नजरों से छुपे अपने दर्द, संघर्ष और अंतर्मन की झंझावतों को बयां करती है। वह खुद को रोज़ झुकाते हुए भी टूटी नहीं है, अपने अंदर के तूफ़ान से रोज़ लड़ती है, लेकिन उसकी चुप्पी, उसका हौसला, उसकी मोहब्बत और उसकी संभावनाएं—किसी की नज़र में नहीं आतीं। यह एक ऐसा आईना है जिसमें हर वो व्यक्ति खुद को देख सकता है जिसने कभी खुद को भीड़ में खोया पाया हो।

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