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ख़त अपने नाम…

आज का खयाल सीधा दिल को छू गया—क्यों न खुद से ही अपनी कीमत पूछी जाए, बजाय दूसरों की नज़रों में ढूँढ़ने के। क्यों न एक ख़त खुद को लिखा जाए, जिसमें अपने ही बचपन की हँसी, अपनी ही रंगीन तितली-सी चंचलता, और अपनी ही खुशबू को फिर से महसूस किया जाए। जीवन की भाग-दौड़ में खोकर हम खुद को सँवारना भूल जाते हैं, लेकिन जब खुद से मुलाक़ात होती है, तो एहसास होता है कि सबसे बड़ा ख़िताब, सबसे सुंदर परिभाषा, हमेशा से हमारे अपने ही नाम थी।

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अंदर की चीख़ें: मुस्कुराते चेहरे के पीछे का तूफ़ान

यह कविता एक ऐसी संवेदनशील आत्मा की आवाज़ है जो दुनियावी दिखावे और भीड़ की नजरों से छुपे अपने दर्द, संघर्ष और अंतर्मन की झंझावतों को बयां करती है। वह खुद को रोज़ झुकाते हुए भी टूटी नहीं है, अपने अंदर के तूफ़ान से रोज़ लड़ती है, लेकिन उसकी चुप्पी, उसका हौसला, उसकी मोहब्बत और उसकी संभावनाएं—किसी की नज़र में नहीं आतीं। यह एक ऐसा आईना है जिसमें हर वो व्यक्ति खुद को देख सकता है जिसने कभी खुद को भीड़ में खोया पाया हो।

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