मिट्टी बनती औरत

स्वेटर- मफलर बुनती औरत,
जब बुनने लगती है
अपनी पहचान,
सिरे से उघड़ने लगता है
उसका आसमान।
या ,भाप बन उड़ जाता है एकाएक
छोड़ के विशाल शून्य ।
शापित सितारों को सीने से लगाये
फसल बुनती औरत, टकटक
तकती है राह
बादल नही ,बारिश नही ,
करियाते दुब में धुँधलाते सितारे।

तब ,असीम धर्य से निरावरण कर छाती,
तान देती है ,मटमैला तार- तार आँचल
छितिज सा….
प्रखर किरणों में तपता-झुलसता
नग्न चर्म – अस्थि ,जीवन!
टप -टप चूता पसीना, बुला लाता है नदी!
हरियाते दूब में तृप्त सितारे
खेलते है छुपा -छुपी…

बीते रात तक दो थकी आँखें, टटोलती रहती हैं
शून्य ,
निःशब्द! समंदर बनती औरत
चिंहुक कर जग जाती देख , दुःस्वप्न…
सितारों के डूबने का दुःस्वप्न
मुट्ठी में भींच कर कलेजा
चूमती है ,उनके दूध- भात के गन्ध वाला मुख
टांक देती है अपने सितारे दूर शून्य में,
और सपने बुनती है…
उसके सितारे बनायेगे अपना आसमा
उसे तो बस जमीन पुख्ता करनी है…
और अपनी पहचान की जमीन ढूंढती मिट्टी सी औरत
मिट्टी बनती जाती है….

सुनीता सिंह, कवयित्री, कोलकाता

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