आज हम बात करेंगे बाप की. वैसे तो भगवान ने एक ही बाप हम सबको अलॉट किया है, लेकिन इस दुनिया में जब आँखें खोलते हैं, तो पता चलता है कि यहॉं तो बापों की बहार आई हुई है. हर कोई बाप बनने की दौड़ में है, कोई बेटा नहीं बनना चाहता. यूँ तो कई ऐसे भी हैं इस संसार में जिन्हें यह भी पता नहीं कि उनका बाप कौन है, और ये महाशय एयरपोर्ट, ट्रैफिक लाइट, रेलवे की विंडो लाइन, सिनेमा की कतार में हाथापाई करते हुए यह कहते मिल जाते हैंतू जानता है, मेरा बाप कौन है? और कई बार कोई न कोई सरफिरा इन्हें जूतमपैजार से याद भी दिला देता है कि इनका बाप कौन है!
फिर अगर बाप विधायक हो जाए तो ममेरे सैंयॉं भये कोतवालफ जैसे भाव से बाप के आशीर्वाद में जन्मे ये भैरव, गली-मोहल्लों में गालियॉं देते फिरते हैं, लोगों को हड़काते रहते हैं! बाप की छवि शुरू से ही इन बाप के हाथों से कुटाई खा-खाकर संस्कारित हुए पीटोकड़ों ने एक कठोर, कद्दावर, खडूस जैसे आदमी की बना दी है! ये वो पीटोकड़े हैं जिन्होंने बचपन से ही बाप के पैरों में जन्नत के अलावा जूते-चप्पल भी देखे हैं्. और बाप ने भी इनको कूट-कूटकर इनमें संस्कार भरने की कोई कसर नहीं छोड़ी.
अब देखिए न, कुछ चीज़ों पर बाप का ही एकाधिकार होता है, लेकिन बेटा है न, कभी उस एकाधिकार का ढंग से शुद्ध और सात्विक उपयोग नहीं करता. बाप की दौलत है तो उड़ाने के काम आएगी, बाप की सड़क है तो अपनी मर्सिडीज से लोगों को कुचलने के काम आएगी, बाप का राज है तो आम जनता पर ज़ुल्म ढाने के काम करेगा. बाप की शोहरत है तो उसे मिट्टी में मिलाने का कार्य करेगा. कहते हैं न, आज के ज़माने में जहॉं गुरु गुड़ ही रह गया और चेला चीनी हो गया, वहॉं बेटा बाप का भी बाप हो गया और बाप बेचारा पति ही बना रह गया.
बाप की हेकड़ी तो सुबह से ही निकलनी शुरू हो जाती है जब घर के सारे सदस्य एकजुट होकर कहने लगते हैं, आप तो रहने ही दो पापा, आपसे नहीं होगा. आप भी न, कौन से ज़माने के हैं पापा, जमाना बदल गया है. बाप को डर लगने लगता है कि कहीं बेटा उसे बदल न दे. अरे बाप की क्या हैसियत, जब घर के टीवी का चैनल ही नहीं बदल सकता, तो क्या खाक कुछ बदलेगा!
कहते हैंबाप बड़ा न भैया, सबसे बड़ा रुपैया. इसलिए कब बाप को वृद्धाश्रम की शरण लेनी पड़ जाए, पता नहीं चलता. बेटा भी अपना असली बाप का चेहरा अपने बाप सरीखे ससुर में देखने लगता है! अब बाप भी तो एटीएम मशीन बनकर रह गए हैं्. बाप की औकात बैंक की चेकबुक से ज़्यादा कुछ नहींजो सिर्फ़ तब ही खुलती है जब पैसे निकालने होते हैं्. वरना कोई हाथ भी नहीं लगाता. जैसे लोग चेकबुक को जेब में रखते हैं, वैसे ही अपने बाप को भी जेब में रखकर चलते हैं्. जहॉं ज़रूरत हो, अपने बाप को जेब से निकालकर अपना काम निकाल लेते हैं्. और बाप बेचारा, इन कर्मजालों की कारगुज़ारी के चलते, ठाणे-कोर्ट-कचहरी के चक्कर लगाकर अपनी चप्पलें घिसवाता रहता है!
कहते हैं नज़रूरत पड़ने पर गधे को भी बाप बनाना पड़ता है. दरअसल, आजकल गधे की नस्ल पहचानना मुश्किल हो गया है. जो भी अपने ज्ञान-अनुभव का बोझा ढो रहा है, वो असल में गधा बनने की कोशिश कर रहा है. जिसके पास जितना बड़ा बोझा, वो उसके नीचे दबकर अपने आप को बड़ा गधा साबित करने की कोशिश में अग्रसर है.
अपने अधकचरे, अधपके ज्ञान और सलाह के कूड़े को दूसरों के दिमाग में भरना चाहता है. वैसे भी यह हम भारतवासियों की सनातनी परंपरा है कि हम हमेशा अपने घर का कचरा दूसरे के घर के सामने डालने की कोशिश करते हैं्. सभी को मालूम है कि जाना खाली हाथ है, इसलिए ज्ञान का बोझा भी यहीं उतार देना चाहते हैं्. और इस कोशिश में ये गधे ढूंढ रहे हैं अपने-अपने शागिर्द, जो उन्हें बाप बना लें्.
वैसे इंडियन बाप चाहे विदेश में रह ले, लेकिन उसका बापपण नहीं जा सकता. अब विदेशों में तो अपना बापपण दिखा नहीं सकता, इसलिए अपनी बीवी-बच्चों को साल में एक-दो बार इंडिया ले आता है, और निकालकर अपनी चप्पलबिलकुल देसी अंदाज़ मेंबच्चों पर बरसाकर अपने बापपण की भड़ास पूरी कर लेता है!
अब तो हर कोई बाप बनने की दौड़ में है. देखो न मित्र, लड़के जो हैं, वो लड़कियों के पीछे भाग रहे हैं कि वो उन्हें बाप बनने का मौका दें्. लेकिन लड़कियॉं आजकल बाप बनने का मौका ही नहीं दे रहीं, बल्कि उन्हें बाप न बनाकर ङ्गबाबू, मेला, प्याला, पप्पूफ बनाकर रख देती हैं्.
मोहल्ले में कोई स्त्री अपने चौखट से बाहर पॉंव रखती नहीं कि मोहल्ले के सभी ठरकी, बाप बनने के लिए पीछे दौड़ पड़ते हैं्.
सोशल मीडिया में तो बाप बनने की होड़ में कई बेचारे ठरकी लोग अपनी डीपी में किसी फिल्मी हीरो का फोटो या अपनी जानवी की फोटो लगाकर हॉंक लगाते नज़र आ रहे हैंङ्घबाप बना दो, बाप!फ जैसे ही फ्रेंड रिक्वेस्ट एक्सेप्ट हुई, वैसे ही इनबॉक्स में अपनी ङ्गबाप बनने की काबिलियतफ बताते हुए प्रकट हो जाते हैं्. इनके घर की औरतों को पता है कि इनकी ङ्गबाप बननेफ की हैसियत नहीं है, इसलिए मोहल्ले में किसी और को ये मौका दे रही हैं्.
बात यहॉं तक तो ठीक है, लेकिन आजकल जो उम्र घुटनों में बाम लगाने की है, उस उम्र में भी कुछ लोग मबाप बननेफ के लिए घुटने घिस रहे हैं्. भला हो डीएनए टेस्ट का, जो कम से कम असली बाप का पता लगा देता है, वरना आदमी बेचारा भीड़ में अपना बाप ही ढूंढता फिरताये साबित करने में कि ङ्गमैं असली बाप की औलाद हूँ्.फ
ये ङ्गबाप बननेफ की चूल कभी-कभी कुछ उम्रदराज नेताओं को भी उठती है. शायद ये वैद्य जी की पुड़िया का कमाल है कि परदादा बनने की उम्र में भी बाप बन रहे हैं! और फिर उन्हीं वैद्य जी को कोस भी रहे हैं किङ्घबाप तो बन गए, लेकिन आपकी पुड़िया डीएनए फिंगरप्रिंट नहीं मिटा पाई!फ अब आयुर्वेद में भी शायद इस पर रिसर्च चल रही होगी कि कोई ऐसी पुड़िया ईजाद हो, जिससे बाप भी बना जा सके और लाठी भी न टूटे.मेरा मतलब, डीएनए टेस्ट में भी पकड़ में न आए!
बाप की चप्पलें घिस गईं बेटे को अपने पैरों पर खड़ा करने मेंताकि उसमें बाप बनने की काबिलियत आ सके. और बेटा है कि बाप का नाम लेकर अपने खानदान की लुटिया डुबोने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा. बाप की पेंशन अपनी लैला के क्रीम-पाउडर पर खर्च हो रही है. बाप के टूटे चश्मे की परवाह नहीं, लेकिन शोना की आइसक्रीम के फ्लेवर की बहुत परवाह है.
बाप, बाप ही होता है और इस बात का एहसास बाप अपने बेटे को किसी न किसी मोड़ पर करा ही देता है. लेकिन अब तो ये बाप का रोल न जाने कब से गैंगस्टरों ने मभाईफ को ट्रांसफर कर दिया है. अब बाप का उतना ख़ौफ़ नहीं रहा, जितना भाई का हो गया है. भाई ही बाप पर हावी होता जा रहा है. बेचारा बाप अब वापस अपने पति-पन के रोल को ही अपनी नियति समझकर बैठ गया है. उसे समझ आ गया है कि बाप का वो रुआब, वो कद्दावर तत्व अब खत्म होने की कगार पर है. बाप रे बाप!

डॉ. मुकेश गर्ग ‘असीमित’ प्रसिद्ध व्यंग्यकार, गंगापुरसिटी (राजस्थान)