“बृज की रज, रबड़ी और राधा

27 सितंबर- राम नहीं नापते मील बृज में रस बरसाते हैं
प्रातः 5:00 बजे उठकर स्नान आदि से निवृत होकर विश्राम स्थल से पुनः दंडवती प्रारंभ की. परिक्रमा मार्ग में बुजुर्ग 108 दंडवती करते हुए मेरा विश्वास बढ़ा रहे हैं. दिन में 10:00 बजे तक करने के पश्चात पुनः राधा कृष्ण पैलेस लौटा. फिर शायद 4:00 बजे के लगभग पुनः प्रारंभ की. गोवर्धन के बाजार में भरपूर भीड़ है. मैं अपनी साइड में पसीने से लथपथ होकर दंडवती आनंद के साथ में कर रहा हूं. रास्ते में एक दुकानदार बुजुर्ग संत की वेशभूषा में, पूरे शरीर पर तुलसी की मालाओं से विभूषित, दिखाई दिए. मालाओं का वजन लगभग सात-आठ किलो होगा. वहीं कुछ आगे पान की दुकान भी थी जो पान के पत्तों से सजी हुई थी. पान इतने सजा के रखे हुए थे की लगता था जैसे पान नहीं, दीवाने-आम हैं.
रास्ते में भक्त प्रेमियों द्वारा खाद्यान्न सामग्री, दूध इत्यादि के भंडारे भी लगे हुए थे, जो कि अपनी कमाई हुई दौलत की गति को सुधार रहे हैं. क्योंकि धन की तीन ही गति हैदान, भोग और नाश. सर्वोत्तम गति है दान, दूसरी है भोग, और यदि दोनों नहीं करें तो फिर नाश होना तय है. एक सज्जन बड़े भाव से खिचड़ी खिलाते हैं और मुझे दंडवती करते देखकर समझाने आते हैं कि यह जो आप आगे पथ-प्रदर्शक (पत्थर) को रखते हो और उसके पीछे पैर रखकर खड़े होते हो इससे आपकी दूरी तय करने में कमी होती, आप आगे भी रखकर कर सकते हो.मैंने उनकी सलाह को विनम्रता से सुनकर कहा-मेरे राम किलोमीटर नापने नहीं आए हैं, बृजरस मय होने आए हैं.मेरे जवाब से उन्हें खुशी हुई, उन्होंने मेरी पीठ ठोककर वंदना की.
फिर रात्रि 10:00 बजे तक दंडवती करने के पश्चात वही रूपरेखा रात्रि विश्राम.

28 सितंबर-दही पराठे और आलू की सब्जी का भोजन
पुनः जल्दी उठकर दंडवती परिक्रमा विश्राम स्थल से आगे उद्धवकुंड तक की. वहीं पर एक बुजुर्ग, सभी यात्रियों को मोटरसाइकिल पर सवार होकर रुक-रुक कर छाछ की सेवा कर रहे थे. उनके भाव से छाछ भी घी का काम कर रही थी. बड़े भाव से उन्होंने मुझे भी पिलाई. विश्राम देकर वापसी अपने गंतव्य पर. आज दही पराठे और आलू की सब्जी का भोजन कर दोपहर का विश्राम किया. विश्राम के पश्चात मंदिर दर्शन के लिए गया. रास्ते में लस्सी की दुकान पर बृजवासियों का मधुर संवाद बृज की भाषा में सुनाई दिया. उनसे बृजभाषा और बृज भजन के बारे में विस्तृत चर्चा हुई. उन्होंने मुझे भजन के लिए आमंत्रित भी किया लेकिन मैंने असमर्थता दंडवत के कारण जता दी, जो कि उचित भी थी.
मासिक रामचरितमानस का पाठ भी मेरा नित्य चल रहा है. भगवान की कृपा से आज भरतजी का प्रसंग आता है, जब वे श्रीराम को वन से वापस लेने जा रहे हैं. तुलसीदास जी कहते हैं. भगवान आपको छोड़कर जिनको घर अच्छा लगता है उनके लिए विधाता विपरीत है.फिर पुनः उद्धव कुंड पहुंचकर दंडवती प्रारंभ की जो कि चलते-चलते आज रात्रि 11:00 बजे राधा कुंड तक पहुंची. रात्रि विश्राम वहीं किया. वापसी में इलेक्ट्रिक मशीन से पूरे शरीर की मसाज करवाई. आज दर्द और जकड़न ज्यादा है, लेकिन मानसिक शांति बहुत है.

29 सितंबर- जहाँ राधा थकान हरती हैं
सुबह पंडित जी के आदेश के अनुसार कपड़े साथ में लेकर राधा कुंड पहुंचा. वहां स्नान करने के पश्चात कपड़े ई-रिक्शा वाले को दिए और परिक्रमा प्रारंभ की. पंडित जी ने कहा था किआपको राधा कुंड तक दर्द होगा, लेकिन जैसे ही स्नान करोगे, राधा रानी सब थकान हर लेंगी वास्तव में ऐसा ही हुआ.दंडवती करते-करते कुसुम सरोवर तक पहुंचा. वहां विश्राम लिया. कुसुम सरोवर विद्युत की रोशनी से जगमगा रहा था अत्यंत मनोरम दृश्य.


30 सितंबरप्रेम, परिश्रम और परिक्रमा
सुबह 5:00 बजे स्नान के पश्चात अचानक मित्र सुनील परिहार का फोन आया-तू कहां है?
मैंने बताया, तो उसने कहा-मैं दानघाटी आ गया हूं.फोन ने मुझे आश्चर्यचकित कर दिया क्योंकि मुझे तो कुसुम सरोवर जाना था. मैंने उसे वही रुकने का बोला और ई-रिक्शा लेकर सुनील के पास पहुंचा.
मैंने पूछा-तू क्यों आया?
तो उसने कहा-यार मन नहीं माना, ऐसा होता हैमित्र, धीरज, धर्म और नारी, आपद काल में परखें जाते हैं. मुझे खुशी भी हुई और उत्साह भी बढ़ा. सुबह चाय लेकर हम कुसुम सरोवर पहुंचे. मित्र के साथ दंडवती प्रारंभ की. पसीने से लथपथ शरीर पर बृजरज और मित्र का साथ आनंद कई गुना बढ़ गया. वह फोटोग्राफी का शौकीन है, आनंद ले रहा था.रास्ते में एक छोटी सी कुटिया मिली जहाँ गाय बंधी थी. मैंने सुनील से कहा कि पूछो दूध मिलेगा क्या?कुटिया वाले ने मुझे दंडवत करते देखा और काली श्यामा गाय का ताजा दूध का लोटा भरकर दिया.हमें ऐसा लगा कि कान्हा और सुदामा साथ हैं और गोपियाँ मधुर दुग्ध पान करवा रही हैं.बिना शक्कर के भी उस दूध में जो आध्यात्मिक मिठास थी, उसका स्वाद आज भी लिखते हुए आँखों में आँसू ला देता है.उसका वर्णन करना, जैसे गुंगे का गुड़ का बखान करना.मुश्किल से जबरन उनको आर्थिक सेवा दी.

करीब डेढ़ किलोमीटर की दंडवत के बाद ई-रिक्शा बुलाया. आज खुद ई-रिक्शा चलाया. उत्साह मित्र के आने से दोगुना हो गया था.राधा कृष्ण पैलेस पहुंचकर स्नान, भोजन और विश्राम किया. शाम को दोनों फिर दंडवत को निकले. ई-रिक्शा वाले से कह दिया कि समय तय नहीं, आराम से विश्राम करना. शाम 5:00 बजे से प्रारंभ किया. रास्ते में सुनील बंदरों को केले खरीदकर खिला रहा था.
7:30 के करीब मानसी गंगा पहुंचे विद्युत से आलोकित, सुंदर दृश्य. बड़ी-बड़ी मछलियाँ, जिन्हें आटे की गोलियाँ खिलाते हैं.
दंडवत करते-करते दानघाटी पहुंचे. वहां रोड पार करते समय महिदपुर रोड के विपुल कसेरा और उनकी माताजी (भाभी जी) मिल गईं. उन्हें देख बड़ा आनंद हुआ. फिर एक सज्जन ने बताया कि हर बार सर का स्पर्श भी पूरा करो और हाथ जोड़ो.

मैं अनभिज्ञ था, लेकिन आज से नियम में शामिल कर लिया. रास्ते में रोटी वाले बाबा का प्रसाद मिला. चंद्रमा की रोशनी में परिक्रमा, मिष्ठान भंडार से रबड़ीआध्यात्मिक और स्वाद दोनों का संगम.मित्र सुनील मेरे मना करने के बावजूद मेरे पैर दबाता है. उसका प्रेम मुझे रोकने नहीं देता.सुबह 4:00 बजे फूलों की दिव्य महक आती है जो हमें फिर ऊर्जा से भर देती है.आज की दंडवती सबसे अधिक हुई शाम 5:00 से सुबह 4:00 बजे तक.
फिर ई-रिक्शा से राधा कृष्ण पैलेस लौटकर विश्राम.

दर्पण सोनी, ट्रेवलर, महिदपुर रोड, उज्जैन

7 thoughts on ““बृज की रज, रबड़ी और राधा

    1. आदरणीय साथियों मुझे इस बात की खुशी है कि आप सभी लोग एक-दूसरे की रचनाओं को पढ़ते हैं और अपनी राय व्यक्त करते हैं. इसी तरह से वरिष्ठ साथी, नवोदित रचनाकारों को प्रोत्साहित करते रहें और समय-समय पर मार्गदर्शन करते रहें. आप अपनी रचनाएं नियमित रूप से भेज कर सहयोग करते रहें.
      सुरेश परिहार, लाइव वॉयर न्यूज

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