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“बृज की रज, रबड़ी और राधा

गोवर्धन की परिक्रमा कोई साधारण यात्रा नहीं, यह आत्मा की तपस्या है। 27 से 30 सितंबर तक की इस दंडवती परिक्रमा में मैंने न केवल शरीर को बल्कि हृदय को भी बृजरज में लोटते पाया। हर कदम, हर प्रणाम में बृज का माधुर्य, भक्ति की ऊष्मा और सेवा का भाव समाया था। भक्तों का प्रेम, रास्ते के भंडारे, बुजुर्गों की प्रेरणा और मित्र का साथ — सबने मिलकर यह यात्रा एक दिव्य अनुभव बना दी। राधा कुंड में स्नान से लेकर कुसुम सरोवर की विद्युत छटा तक, हर पड़ाव ने मुझे भीतर तक छू लिया। यह यात्रा थी—तन की थकान को तज कर मन की शांति पाने की।

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