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माँ और केश

माँ की याद और भावनात्मक दूरी को दर्शाता समुद्र किनारे खड़ा एक व्यक्ति। समय के साथ दूरियाँ बढ़ सकती हैं, लेकिन माँ की स्मृतियाँ मन में बनी रहती हैं।

शेर सिंह “स्नायु” पनारसा (हिमाचल प्रदेश)

“अब पेड़ों के पत्तों पर
माँ की धूप नहीं बैठती।
दो नदियाँ अब
एक जगह नहीं बहतीं।
मैं नदी से समुद्र बन बैठा हूँ,
मगर माँ का स्नेह
नहीं पहुँचता मुझ तक अब।

प्रेम जब गुजरेगा
माँ की धूप से मुझमें,
तब केशों को पतझड़ समेट लेगी।
मगर अब कब?
सब नमक बन बैठा है मुझमें।”

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