gulmohar
माँ की याद और भावनात्मक दूरी को दर्शाता समुद्र किनारे खड़ा एक व्यक्ति।

माँ और केश

शेर सिंह “स्नायु” पनारसा (हिमाचल प्रदेश) “अब पेड़ों के पत्तों परमाँ की धूप नहीं बैठती।दो नदियाँ अबएक जगह नहीं बहतीं।मैं नदी से समुद्र बन बैठा हूँ,मगर माँ का स्नेहनहीं पहुँचता मुझ तक अब। प्रेम जब गुजरेगामाँ की धूप से मुझमें,तब केशों को पतझड़ समेट लेगी।मगर अब कब?सब नमक बन बैठा है मुझमें।” इन रचनाओं को…

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माँ तेरा आँचल – हृदयस्पर्शी हिंदी कविता

माँ तेरा आँचल…

‘माँ तेरा आँचल’ कविता माँ के स्नेह, ममता और सुरक्षा के उस भावलोक को चित्रित करती है जहाँ आँचल ही संसार बन जाता है। यह रचना बचपन की स्मृतियों और मातृत्व की गरिमा को सरल शब्दों में जीवंत कर देती है।

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सोना

प्रसव के बाद थकी-हारी गीतू मायके से किसी के आने की उम्मीद लगाए चिंतित है। आर्थिक तंगी और दूरी के कारण उसे लगता है कि कोई नहीं आएगा। मन में यह भी कसक है कि काश बेटी होती तो पिता का बोझ हल्का होता। तभी सासू माँ फोन पर सबको खुशी से बेटे के जन्म की खबर देती हैं और मालिशवाली को बुलाकर कहती हैं — सवा महीने बाद बड़ा फंक्शन होगा। गीतू अपनी चिंता बताती है कि मायके से सोना-चांदी आदि कैसे आएंगे, तो सास lovingly कहती हैं — “सोना-चांदी तो दादा-दादी की ओर से आएगा, तुमने हमें पोते के रूप में खरा सोना दिया है।” यह सुनकर गीतू भावुक होकर अपनी सास से लिपट जाती है अपनी दूसरी माँ की तरह।

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