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एक पेड़, दो तस्वीरें और दर्द

घर की गैलरी के पास पेड़ और बाद में ठूंठ बना वही वृक्ष जिस पेड़ को बचाने के लिए घर की गैलरी बदली गई, उसी पेड़ को ठूंठ बना देखकर मन दुखी हो गया.

एक पेड़ की दर्दभरी कहानी

बंसीलाल परमार, प्रकृति प्रेमी, साहित्यकार एवं फोटोग्राफर

मैं जब भी सुवासरा से रतलाम की ओर ट्रेन से यात्रा करता हूं, तो रास्ते में दिखाई देने वाले दृश्य केवल मेरी आंखों से होकर नहीं गुजरते, वे मन में भी अपनी जगह बना लेते हैं. प्रकृति से मेरा जुड़ाव कुछ ऐसा है कि कोई पेड़, कोई पक्षी या कोई परिचित दृश्य एक बार मन को छू जाए, तो फिर उससे एक रिश्ता-सा बन जाता है. उसके बारे में जानने, उसे दोबारा देखने और उसकी कुशलता महसूस करने की इच्छा बनी रहती है.
ऐसा ही एक रिश्ता महिदपुर रोड स्टेशन के पास, पूर्व शुगर मिल से पहले दिखाई देने वाले एक पेड़ से बन गया था.पहली बार जब मैंने उस पेड़ को देखा, तो मन में उसके प्रति सम्मान उमड़ आया. पेड़ घर के बिल्कुल बगल में था. सामान्यतः ऐसी स्थिति में मकान के निर्माण या विस्तार के समय पेड़ को बाधा मानकर काट दिया जाता है, लेकिन इस परिवार ने ऐसा नहीं किया. गृहस्वामी ने पेड़ को बचाने के लिए अपने मकान की गैलरी की रचना तक बदल दी. अपने घर के नक्शे में बदलाव स्वीकार किया, लेकिन पेड़ को कटने नहीं दिया. यह मेरे लिए केवल एक पेड़ को बचाने की घटना नहीं थी. यह प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता, जिम्मेदारी और मनुष्यता का सुंदर उदाहरण था.
मैंने पार्सल गाड़ी में यात्रा करते समय उस दृश्य को अपने कैमरे में कैद किया था. पहली तस्वीर में घर और उसके पास खड़ा पेड़ दिखाई देता है. उस दृश्य ने मुझे इतना प्रभावित किया कि मैंने फेसबुक पर गृहस्वामी की प्रशंसा करते हुए एक भावुक पोस्ट लिखी थी. मन में यही भाव था कि ऐसे लोगों को नमन करना चाहिए, जो अपने स्वार्थ और सुविधा से ऊपर उठकर प्रकृति के लिए जगह बनाते हैं. मेरी इच्छा थी कि दूसरे लोग भी इस परिवार से प्रेरणा लें और अपने आसपास के पेड़ों को बचाने का प्रयास करें.उस समय यह दृश्य मेरे लिए एक सुखद अनुभव था. लगा था कि आज भी ऐसे लोग हैं, जिनके लिए पेड़ केवल लकड़ी या जमीन पर खड़ा एक पौधा नहीं, बल्कि जीवन का हिस्सा है.
फिर 23 अगस्त 2026 को उसी रास्ते से, उसी ट्रेन में यात्रा करने का अवसर मिला. मेरी नजर अनायास ही उस परिचित घर और पेड़ को तलाशने लगी. जैसे किसी अपने से मिलने की उम्मीद हो. मैं देखना चाहता था कि वह पेड़ अब कैसा है, कितना बड़ा हुआ है, उसकी शाखाएं कितनी फैली हैं.
उसे देखकर मन को फिर वही सुकून मिलने की उम्मीद थी, जो पहली बार उसे देखकर मिला था.लेकिन इस बार दृश्य बिल्कुल अलग था. जिस पेड़ को बचाने के लिए गृहस्वामी ने अपने मकान की गैलरी की बनावट तक बदल दी थी, वह अब हरा-भरा वृक्ष नहीं रह गया था. उसकी जगह एक ठूंठ दिखाई दे रहा था. उसे उस अवस्था में देखकर मन बुझ गया. जिस पेड़ को बचाने के प्रयास ने मुझे गर्व और प्रसन्नता से भर दिया था, उसी पेड़ का इस तरह बदल जाना भीतर तक दुखी कर गया. मेरी आदत है कि किसी ऐसी चीज से लगाव हो जाए, तो उसे केवल एक बार देखकर भूल नहीं पाता. मन बार-बार उसके पास लौटता है. जैसे परिवार का कोई सदस्य दूर रहता हो और उसकी कुशलता जानने की इच्छा बनी रहती हो. उस पेड़ के साथ भी मेरा कुछ ऐसा ही भावनात्मक रिश्ता बन गया था. इसलिए उसे ठूंठ के रूप में देखना केवल एक दृश्य देखना नहीं था, बल्कि किसी परिचित के उजड़ जाने जैसा अनुभव था.
हालांकि, मैं यह नहीं जानता कि पेड़ की ऐसी स्थिति कैसे हुई. संभव है कि किसी प्राकृतिक बाधा, पानी की कमी, जड़ों तक पोषण न पहुंचने या रेलवे की सीमा से जुड़ी किसी परिस्थिति ने उसके विकास को प्रभावित किया हो. इसके पीछे कोई अन्य कारण भी हो सकता है. बिना वास्तविक जानकारी के किसी पर दोषारोपण करना उचित नहीं होगा. लेकिन इतना जरूर है कि उस सुंदर वृक्ष का ठूंठ में बदल जाना दुखद है.
मन में यह सवाल भी उठता है कि जिस पेड़ को बचाने के लिए एक परिवार ने अपने घर की बनावट में बदलाव किया, क्या उसकी देखभाल और संरक्षण के लिए भी कोई प्रयास हो सकता था? यदि किसी कारण से पेड़ कमजोर हो रहा था, तो क्या समय रहते उसकी स्थिति पर ध्यान दिया जा सकता था? ये सवाल किसी को कटघरे में खड़ा करने के लिए नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति हमारी जिम्मेदारी को याद दिलाने के लिए हैं.
उस परिवार के प्रति मेरे मन में आज भी सम्मान है, जिसने कभी एक पेड़ के लिए अपने घर की गैलरी की रचना बदल दी थी. उनका वह निर्णय अपने आप में प्रेरणादायक था और रहेगा.
साथ ही, उस पेड़ की वर्तमान स्थिति ने मुझे यह सोचने पर विवश किया है कि प्रकृति के प्रति हमारा प्रेम केवल भावनाओं और प्रशंसा तक सीमित न रहे. उसे संरक्षण, देखभाल और निरंतर जिम्मेदारी में भी बदलना होगा. मैं चाहता हूं कि इन दोनों तस्वीरों को लोग केवल एक पेड़ के जीवन में आए बदलाव के रूप में न देखें.
पहली तस्वीर हमें बताती है कि मनुष्य चाहे तो प्रकृति के लिए अपने जीवन और सुविधाओं में जगह बना सकता है. दूसरी तस्वीर हमें याद दिलाती है कि संरक्षण का काम एक दिन या एक निर्णय से पूरा नहीं होता. यदि हम किसी पेड़ को बचाते हैं, तो उसके जीवित रहने की चिंता भी हमारी जिम्मेदारी बनती है. घर बनाना जरूरी है, लेकिन घर के आसपास जीवन बचाए रखना भी उतना ही जरूरी है. विकास की राह पर चलते हुए यदि हम प्रकृति को साथ लेकर चलें, तो आने वाली पीढ़ियों को केवल पेड़ों की तस्वीरें नहीं, बल्कि उनकी छांव, हरियाली और जीवन भी दे सकेंगे.
एक प्रकृति प्रेमी, साहित्यकार और फोटोग्राफर के रूप में इस पेड़ से जुड़ा मेरा अनुभव यही कहता है कि प्रकृति के साथ रिश्ता बना लेना आसान है, लेकिन उस रिश्ते को निभाने के लिए संवेदनशीलता के साथ निरंतर प्रयास भी जरूरी हैं. काश, वह पेड़ आज भी हरा-भरा होता. जब भी उस रास्ते से गुजरता, उसे देखकर मन प्रसन्न होता. फिलहाल, उसकी स्मृति और उसकी दोनों तस्वीरें मेरे पास हैं. एक तस्वीर उस परिवार के प्रकृति प्रेम को सलाम करती है, दूसरी मन में एक कसक छोड़ जाती है.

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2 thoughts on “एक पेड़, दो तस्वीरें और दर्द”

  1. आपका हार्दिक आभार सर मेरी व्यथा और पीड़ा भरे संस्मरण को आपने संप्रेषण योग्य पाया केवल ये ही पेड़ नहीं ऐसे अनेक पेड़ जो राहों से गुजरते हुऐ मेरे अपने बने हैं ।
    वृक्ष रक्षति रक्षित:

    1. धन्यवाद सर,
      आपके अनुभवों से हमारे लेखकों को भी समय-समय पर अवगत कराते रहे, हमसे जुड़ने के लिए आपका आभार, हमारे 4 हजार से ज्यादा लेखकों का परिवार आपके विचारों की प्रतीक्षा कर रहा है..
      सुरेश परिहार

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