
सपना रमणभाई पटेल
हाँ, वह आया था… श्री,
मेरी ख़्वाहिशों को दहलीज़ तक लिए…
और मैं, हाँ, मैं तो मुंतज़िर थी,
पलक झपकने जितनी… उसकी,
फिर ऐसा क्या हुआ… श्री,
वह दरवाज़े से ही लौट गया!
तुम्हें पता है…? उसका साया,
कमरे के भीतर तक आ गया था!
देखते ही, मैं बावली उस ओर दौड़ी,
मैंने तनिक छुआ भी उसको…!
पर, वह कैसे सरपट निकल गया..!
फिर मैं उसे बहुत दूर तलक तकती रही,
हाँ, यह वही मेरा अतीत है… श्री,
जो आज भी मेरे साथ ही है!
वह हर रोज़ भोर की दस्तक पर,
मेरी पलकों पर सहर करता है!
हाँ, ये ख़्वाब-ए-हसरत भी वही है!
जिसे दररोज़ कशीदे की तरह बुनती हूँ!
बस भूल वहाँ हो जाती है…!
सुई में डले धागे का छोर,
बिन गाँठ ही रह जाता है…!
फिर, फिर क्या… श्री,
आहिस्ता-आहिस्ता उसी धागे से,
सारे ख़्वाब उधड़ जाते हैं…!!
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