gulmohar

फिर वही सपना

खिड़की के पास बैठी स्त्री, जिसकी आँखों में अधूरे सपनों और पुरानी यादों की उदासी है। कुछ ख़्वाब दहलीज़ तक आते हैं और फिर अधूरे रह जाते हैं।

सपना रमणभाई पटेल

हाँ, वह आया था… श्री,
मेरी ख़्वाहिशों को दहलीज़ तक लिए…
और मैं, हाँ, मैं तो मुंतज़िर थी,
पलक झपकने जितनी… उसकी,
फिर ऐसा क्या हुआ… श्री,
वह दरवाज़े से ही लौट गया!

तुम्हें पता है…? उसका साया,
कमरे के भीतर तक आ गया था!
देखते ही, मैं बावली उस ओर दौड़ी,
मैंने तनिक छुआ भी उसको…!
पर, वह कैसे सरपट निकल गया..!

फिर मैं उसे बहुत दूर तलक तकती रही,
हाँ, यह वही मेरा अतीत है… श्री,
जो आज भी मेरे साथ ही है!
वह हर रोज़ भोर की दस्तक पर,
मेरी पलकों पर सहर करता है!

हाँ, ये ख़्वाब-ए-हसरत भी वही है!
जिसे दररोज़ कशीदे की तरह बुनती हूँ!
बस भूल वहाँ हो जाती है…!

सुई में डले धागे का छोर,
बिन गाँठ ही रह जाता है…!
फिर, फिर क्या… श्री,
आहिस्ता-आहिस्ता उसी धागे से,
सारे ख़्वाब उधड़ जाते हैं…!!

इन रचनाओं को भी पढ़िए और अपनी राय अवश्य व्यक्त करें

घुँघरू
थोड़ी सी नमी बाकी रहने दो
चेहरे और नक़ाब
मंदिर की वो पावन मुलाकात
आदि शक्ति जगदंबे भवानी
प्रेम मिलन
दूरियों के पार प्रेम
सितारों से सजी है जो…
वह दस मिनट… जो जिंदगी भर नहीं भूल पाऊंगी
भरोसे की डोर
मुन्ना से कीर्ति राणा
औरत का मायका: सामने होकर भी कितना दूर

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *