किश्वर अंजुम की पुस्तक परछाइयां अंधरों की से एक लंबी कहानी का पहला भाग

किश्वर अंजुम, भिलाई
उसने गर्म दुलई को सिर से पाँव तक खींच लिया, उसमें दुबक सी गई और आँखें बंद करके ऊपरवाले को पुकारने लगी।
उसे ख़ुद पर तरस आ रहा था। किस हाल में थी वो आज।
न मालूम सुबह तक क्या होगा! सुबह होगी तो क्या वो दरवाज़ा खोल भी पाएगी?
“अम्मा! मेरे पास आ जाओ।”
आँखों में आँसू भर आए।
अम्मा, उसे कितना दुलार करती थीं, रात को अपने पास ही सुलातीं और वो माँ के आँचल में दुबक कर दुनिया के जंजालों से महफ़ूज़ समझती अपने आपको।
ये, उम्र बढ़ती क्यों है? माँ के घर ही क्यों नहीं रह सकती लड़कियाँ?
अब्बा उससे कह रहे थे, “बेटा! नया रिसाला कैसा लगा?”
“रेशमी धागे का रंग कच्चा तो नहीं निकला इस बार?”
“नहीं अब्बा! कितने ख़ूबसूरत पक्के रंग हैं।”
वो रेशमी धागों की लच्छियों से अपने रुख़सार सहलाने लगी! ख़यालों में ज़िंदगी के पलटे हुए वरक खुल गए और वो धीरे-धीरे नींद के आग़ोश में चली गई।
अचानक उसके कानों में आवाज़ गूँजी,
“वो चिड़िया उसकी माँ ही है।”
नींद उचट गई। धीमे से एक आँख से चादर सरकाई। चिड़िया पैताने-सिरहाने की मंज़िलें तय करने में मशगूल थी।
“वो चिड़िया, उसकी माँ ही है, वो चिड़िया उसकी माँ ही है, वो चिड़िया उसकी माँ ही है…”
सर्दी के मौसम में पसीने ने उसे नहला दिया, शायद बेहोश हो गई वो।
वो 22 बरस की ही थी और शादी को दो साल हो गए थे। पति डॉक्टर थे और सरकारी अस्पताल में पोस्टिंग थी। युवा डॉक्टर्स को नौकरी के शुरुआती दौर में सुदूर इलाकों के नए बने अस्पतालों में पोस्टिंग दी जाती थी। पति की नौकरी की ज़िम्मेदारियाँ ऐसी थीं कि उन्हें हर पखवाड़े दूर-दराज़ के गाँवों में मेडिकल कैंप लगाना पड़ता था। आज से पचास वर्ष पूर्व मध्यभारत के एक ब्लॉक में एक कमरे के सरकारी मकान में दोनों मियाँ-बीवी रहते थे।
अभी कोई औलाद नहीं थी और जब शौहर कई-कई दिनों के लिए दौरे पर जाते तो वो बौलाई-बौलाई फिरती। अकेली जान का काम ही कितना रहता? शौहर जब कस्बे में रहते तो उनके लिए नाश्ता, खाना बनाती। उनके कपड़े धोती, कोयले सुलगा कर लोहे की इस्तरी में डालकर उनके कपड़े प्रेस करती। तह लगाती। ट्रंक में हिफ़ाज़त से रखती। शाम को उनका इंतज़ार करती और जब वो आ जाते तो लकड़ी सुलगा कर उनके नहाने का पानी गर्म करती। वो नहा लेते तो उन्हें गर्म-गर्म चाय देती। उनके गीले कपड़े काँचती। आँगन में बँधी रस्सी पर फैलाती। रात के आठ बजते ही चूल्हे की गरम-गरम रोटियाँ सेंक कर शौहर को डिनर कराती। कभी-कभी शौहर को दुलार आता तो अपनी बालिका वधु को अपने हाथ से दो-चार निवाले खिला देते। खाने के बाद बावर्चीखाना (किचन) साफ़ करती। छुही मिट्टी से पूरा चूल्हा और किचन कपड़े की चिंदी के ज़रिए लीपती और नहा-धोकर आराम करती।
सुबह भी मियाँ के इर्द-गिर्द ही उसकी दुनिया घूमती। जब वो अस्पताल चले जाते तो कभी सिलाई करती, कभी स्वेटर, मफलर बुनती, कभी बेवजह घर के सामान की उठापटक करके सफ़ाई करती। शाम को एक घंटे कॉलोनी की महिलाएँ मिलतीं, बातें होतीं, हँसी-मज़ाक होता और फिर सब अपने घरों को चली जातीं। उसके दिन आराम से गुज़रते, लेकिन जब मियाँ दौरे पर रहते और चार-पाँच दिन घर नहीं आते तो उसे समझ नहीं आता, वक्त कैसे गुज़ारे। अकेली जान के लिए खाने का क्या एहतिमाम करे? ज़रा सा कुछ बना लेती और उसी को लंच-डिनर में चलाती।
पढ़ने का उसे बहुत शौक़ था, अख़बार का एक-एक अक्षर चाट जाती। दहेज़ में अब्बा ने ढेरों किताबें दी थीं। अकेले रहती तब उन्हीं में खोई रहती। दिन किसी तरह कट जाता। रात को आठ बजे से सोने की कोशिश करती। लाइट नहीं थी तब उस इलाके में, अकेली जान को अकेले डर लगता घर में, तो लालटेन की रोशनी धीमी करके किसी तरह रात गुज़ार लेती।
कहानी का अगला भाग-अगले अंक में जरुर पढ़ें
