
नीति पांडेय
विपरीत हवाओं में उड़ना कठिन तो है
हाथों में आग थाम के चलना कठिन तो है
बनाते हैं सारे काम बदलने से चित्त के
पर चित्त के चरित्र बदलना कठिन तो है
गुलशन में उसने जाने क्यों काँटे उगाए हैं
काँटों में खुशबुओं का मिलना कठिन तो है
जो काव्य की कलम से प्रेम को न लिख सके
उस गीत का सुरों में ढलना कठिन तो है
सहरा में खिले फूल को नीति का है नमन
सहरा में किंतु फूल खिलना कठिन तो है
