
प्रीति राही
बड़े मंच से आमंत्रण मिला तो वह देर तक चुप बैठी रही। चेहरे पर खुशी थी, मगर मन में एक विचार बार-बार दस्तक दे रहा था।
उसने सोचा,
“मैं अकेली क्यों जाऊँ? मेरे साथ कोई और भी चले। शायद उसे भी वह मंच मिले, जिसकी वह भी प्रतीक्षा कर रही है।”
उसने अपनी एक परिचित से कहा,
“चलोगी मेरे साथ? मंच बड़ा है, अवसर अच्छा है। तुम्हें भी आगे आने का मौका मिलेगा।”
सामने से हँसते हुए उत्तर मिला,
“क्यों? आपको स्टेपनी चाहिए?”
वह कुछ क्षण मौन रही। शब्द छोटा था, मगर उसके भीतर कहीं बहुत गहरा उतर गया।
उसने कोई सफाई नहीं दी। बस मुस्कुराकर कहा,
“नहीं, मुझे स्टेपनी की जरूरत नहीं है। मैं तो चाहती थी कि जिस रास्ते पर मुझे चलने का अवसर मिला है, उस पर मेरे साथ कोई और भी आगे बढ़े।”
वह लौट आई।
उस रात उसने अपनी डायरी खोली और लिखा,
“मेरे दिल में सबके लिए प्रेम है, इसलिए मैं अकेली ऊँची उड़ान नहीं भरना चाहती।
मगर अब समझ आया, हर कोई साथ दिए हुए हाथ को सहारा नहीं समझता। कुछ लोग उसे अपनी कमजोरी समझ लेते हैं।
फिर भी मैं अपना स्वभाव नहीं बदलूँगी। क्योंकि किसी को आगे बढ़ाने की कोशिश में अगर मुझे गलत समझ लिया जाए, तो यह उसकी दृष्टि की कमी है, मेरे हृदय की नहीं।”
उसने डायरी बंद की और मुस्कुरा दी।
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