शिक्षा, साहित्य, बच्चों की दुनिया और उन अनकही संवेदनाओं
पर प्रसिद्ध लेखिका ममता सिंह से बातचीत

सुरेश परिहार, संपादक, लाइव वायर न्यूज़, पुणे
विज्ञान ने उन्हें तर्क दिया, शिक्षा ने दृष्टि और साहित्य ने अपनी बात कहने की भाषा. ममता सिंह की यात्रा इन तीनों का सुंदर संगम है. शिक्षिका, शिक्षक-प्रशिक्षक, कवयित्री और आकाशवाणी कलाकार के रूप में उन्होंने जीवन को केवल देखा नहीं, बल्कि करीब से जिया और समझा है.
उनकी रचनाओं में स्मृतियाँ हैं, रिश्तों की गर्माहट है, स्त्री-मन की अनकही आवाज है और समाज को लेकर एक सजग दृष्टि भी. कविता उनके लिए केवल अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि उन भावों से संवाद है, जिन्हें शब्दों में कहना हमेशा संभव नहीं होता. इसी बहुआयामी रचनात्मक यात्रा, शिक्षा के प्रति उनके दृष्टिकोण और साहित्य को लेकर उनके सपनों पर लाइव वायर न्यूज के संपादक सुरेश परिहार से बेबाक बातचीत के प्रमुख अंश-
प्रश्न 1. आपने एम.एससी. (केमिस्ट्री), बी.एड., एम.एड. और एम.ए. (हिंदी व्यावसायिक लेखन) जैसी अलग-अलग क्षेत्रों में शिक्षा हासिल की. विज्ञान और साहित्य के इस अनोखे संगम ने आपके लेखन को किस तरह प्रभावित किया?
उत्तर: शायद मेरे लिए विज्ञान से साहित्य तक का सफर विषय बदलने का नहीं, बल्कि अपनी दृष्टि के विस्तार का सफर रहा है. जिस तरह जिंदगी के कई पड़ाव होते हैं, उसी तरह आपकी सोच भी कई मोड़ों से होकर गुजरती है.
एम.एससी. (केमिस्ट्री), बी.एड., एम.एड. और फिर इसके बाद एम.ए. (हिंदी-व्यावसायिक लेखन) के बीच काफी फासला रहा. इस फासले ने मुझे समय के साथ जीवन को भी पढ़ने का मौका दिया. इस दौरान मैं और अधिक परिपक्व हुई, जीवन के विभिन्न पक्षों से परिचित हुई, साथ ही स्वयं में व्याप्त भावनाओं की अनेक परतों को समझने की दृष्टि विकसित हुई.विज्ञान जहाँ तर्क और विश्लेषण से देखना सिखाता है, वहीं साहित्य संवेदनाओं व अनुभवों को व्यक्त करने का साहस देता है. इसलिए मेरे लेखन में केवल कल्पना नहीं, बल्कि स्वयं पर गुजरी वास्तविक घटनाएँ, अनुभूतियाँ और अनुभव हैं, जिन्हें मैं शब्दों में ढालकर पन्नों पर उतारती हूँ. मेरे लिए विज्ञान और साहित्य दोनों ही एक से लगते हैं. विज्ञान की धारणा पर साहित्य खूब पनपता है. जैसे-हर क्रिया की प्रतिक्रिया है. यह न्यूटन का तीसरा नियम है, परंतु इसमें महसूस करके कहने की भाषा भी है, सिद्धांत भी है और व्यवहार भी.
प्रश्न 2. शिक्षिका, काउंसलर और टीचर ट्रेनर के रूप में लंबे अनुभव ने आपको बच्चों और अभिभावकों के मन को करीब से समझने का अवसर दिया. आज के दौर में बच्चों की परवरिश की सबसे बड़ी चुनौती आपको क्या लगती है?
उत्तर: आज आप बच्चों को कोई उपदेश या ज्ञान के जरिए नहीं सिखा सकते. जो गुण, आदतें या मूल्य आप बच्चे में देखना चाहते हैं, उन्हें आपको स्वतः अपने जीवन में ढालना पड़ेगा. इसकी शुरुआत बच्चे के फॉर्मेटिव ईयर्स में ही करनी होगी, क्योंकि बच्चे हमारी बातें कम, हमारा व्यवहार अधिक देखते और सीखते हैं.
बच्चों की सही परवरिश आज की सबसे बड़ी चुनौती है, क्योंकि सही क्या है, इसकी कोई निश्चित परिभाषा नहीं होती. आज की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि बच्चे एक ऐसे समय में बड़े हो रहे हैं, जहाँ उनके सामने सूचनाओं और विकल्पों की कोई कमी नहीं है. सोशल मीडिया और डिजिटल दुनिया ने उनका एक्सपोज़र बहुत बढ़ा दिया है. इसलिए उन्हें हर चीज से रोकना या उनके लिए हर निर्णय लेना समाधान नहीं है. हमें उन्हें क्या देखना है से ज्यादा क्या चुनना है सिखाना होगा; क्या सोचना है से ज्यादा कैसे सोचना है सिखाना होगा.
अच्छी परवरिश का अर्थ बच्चों को उनकी गलती से सीखने की ओर प्रेरित करना है, न कि उनकी असफलता पर तंज कसना. उनकी असफलताओं पर कटाक्ष की जगह हँसकर उनके कंधे पर हाथ रखने की जरूरत है. उन पर अतिरिक्त उम्मीदें रखना हानिकारक है. बच्चे व अभिभावक के बीच इतनी सहजता होनी चाहिए कि बच्चा अपनी समस्या कहने में जरा भी न हिचके, क्योंकि बच्चों व माता-पिता के बीच कम संवाद आज की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है, जिससे अनेक वैचारिक मतभेद उत्पन्न होते हैं.

प्रश्न 3. राइजिंग किड्स प्रीस्कूल की संस्थापक सदस्य के रूप में काम करने के साथ आपने किड्ज़ी, यूरोकिड्स और आईबीटी इंस्टीट्यूट जैसे संस्थानों में भी भूमिका निभाई. शिक्षा के क्षेत्र में आपके लिए अच्छी शिक्षा की वास्तविक परिभाषा क्या है?
उत्तर: सबसे पहले मुझे किड्ज़ी के साथ काम करने का अवसर मिला, जो प्रीस्कूल के क्षेत्र में एक बड़ा नेटवर्क है. इसके बाद मैंने अपना स्वयं का प्रीस्कूल, राइजिंग किड्स, शुरू किया और फिर यूरोकिड्स के साथ भी काम किया. इन वर्षों में मैंने बहुत करीब से देखा कि एक बच्चा जब दो-ढाई वर्ष की उम्र में पहली बार स्कूल आता है, तो उसके पास अपनी भावनाएँ व्यक्त करने के लिए केवल एक ही माध्यम होता हैरोना. लेकिन कुछ वर्षों की प्रीस्कूल शिक्षा के बाद, लगभग छह वर्ष की उम्र तक, वही बच्चा अपने आपको, अपने आसपास के लोगों और परिवेश को समझने और पहचानने लगता है. अपने आपको अभिव्यक्त कर पाता है. मेरे लिए प्रीस्कूल शिक्षा का उद्देश्य केवल बच्चे को अल्फाबेट और नंबर्स सिखाना नहीं, बल्कि उसके सामाजिक, भावनात्मक, शारीरिक, सांस्कृतिक और बौद्धिक विकास की मजबूत नींव रखना है. गतिविधियों, खेल और अनुभवात्मक शिक्षण के माध्यम से बच्चे कम्युनिटी हेल्पर्स, प्रकृति और पर्यावरण के प्रति जागरूक होना सीखते हैं. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हर बच्चा अलग होता है और उसकी अपनी विशिष्ट क्षमताएँ होती हैं.
प्रारंभिक वर्षों में उन क्षमताओं को पहचानना और उन्हें सही दिशा देना शिक्षा की बड़ी जिम्मेदारी है. इसके बाद आईबीटी इंस्टीट्यूट में मुझे स्नातक और स्नातकोत्तर विद्यार्थियों के साथ काम करने का अवसर मिला, जहाँ वे बैंकिंग, एसएससी और रेलवे जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते थे. वहाँ मैं अपना इंस्टीट्यूट संभालने के साथ-साथ करंट अफेयर्स की कक्षाएँ भी लेती थी. उन विद्यार्थियों के साथ एक अलग तरह की शैक्षिक चुनौती होती है. इन युवाओं को मेहनत के साथ उत्साह, निरंतरता, जज़्बा और सबसे बढ़कर आत्मविश्वास आवश्यक था.इसलिए मेरे लिए अच्छी शिक्षा का अर्थ केवल अच्छे अंक या किसी परीक्षा में सफलता प्राप्त करना नहीं है. अच्छी शिक्षा वह है, जो व्यक्ति को अपनी क्षमताओं को पहचानने, अपनी कमजोरियों पर काम करने, सही निर्णय लेने और आत्मविश्वास के साथ जीवन की चुनौतियों का सामना करने योग्य बनाए. मेरे लिए शिक्षा का उद्देश्य ज्ञान के साथ विवेक, क्षमता के साथ आत्मविश्वास और सफलता के साथ संवेदनशीलता विकसित करना है. जब शिक्षा किसी व्यक्ति को एक बेहतर विद्यार्थी के साथ-साथ एक बेहतर इंसान भी बनाती है, तभी वह वास्तव में अच्छी शिक्षा कहलाती है.
प्रश्न 4. आपकी स्वरचित कविताओं का आकाशवाणी अहमदाबाद से नियमित प्रसारण हुआ है. रेडियो के माध्यम से अपनी कविता श्रोताओं तक पहुँचने का अनुभव आपके लिए कैसा रहा और क्या रेडियो ने आपके लेखन की शैली को प्रभावित किया?
उत्तर: हम जिस समय में बड़े हुए हैं, उस समय आकाशवाणी से जुड़ना अपने आप में सम्मान और गर्व का विषय हुआ करता था. ऐसे में आकाशवाणी अहमदाबाद से मेरी स्वरचित कविताओं का प्रसारण होना मेरे लिए बेहद सुखद और प्रेरणादायक अनुभव रहा. रेडियो पर अपनी आवाज में अपनी कविता को श्रोताओं तक पहुँचते सुनना एक अलग ही तरह का आत्मविश्वास और प्रेरणा देता था. मेरा मानना है कि जब आपकी आवाज की पहुँच का दायरा बढ़ता है, तो आपकी जिम्मेदारी भी उतनी ही बढ़ जाती है. आकाशवाणी ने मुझे सामाजिक सरोकारों के प्रति और अधिक सजग किया. मैंने महसूस किया कि लेखन केवल अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि समाज से संवाद का माध्यम भी है.
इसलिए मेरी कोशिश रही कि मैं अपने आसपास के जीवन, समाज में व्याप्त प्रमुख विषयों और मानवीय संवेदनाओं को अपनी कविताओं में स्थान दूँ.इस अर्थ में आकाशवाणी ने मेरे लेखन की दिशा और दृष्टि को निश्चित रूप से अधिक सामाजिक, सजग और जिम्मेदार बनाया.
प्रश्न 5. आपकी रचनाओं में स्मृतियाँ, प्रकृति, रिश्ते, स्त्री-मन और अनकही संवेदनाएँ प्रमुखता से दिखाई देती हैं. इन विषयों की ओर आपका रचनात्मक आकर्षण कैसे विकसित हुआ?
उत्तर: हम जिस समय बड़े हो रहे थे, उस समय प्रकृति अपने बहुत सुंदर और सहज रूप में हमारे आसपास थी. हमारा संयुक्त परिवार था, जहाँ रिश्तों में अपनापन था. साथ बैठकर हँसी-ठिठोली और देर तक बातें करने का वक्त था. उस समय मोबाइल या सोशल मीडिया जैसी व्यस्तताएँ नहीं थीं, इसलिए संवाद अधिक था और रिश्तों में निकटता भी अधिक थी.शायद यही वजह है कि उस दौर की स्मृतियाँ आज भी मन के किसी कोने में सुरक्षित हैं. जब मैं लिखती हूँ, तो वे स्मृतियाँ अनायास ही शब्दों में उतर आती हैं.मेरा मानना है कि मनुष्य वही गहराई से लिख पाता है, जिसे उसने स्वयं जिया हो, महसूस किया हो या जिसके बहुत करीब से गुजरा हो. इसलिए मेरी रचनाओं में बीता हुआ समय, प्रकृति और रिश्तों की संवेदनाएँ बार-बार लौटती हैं.जहाँ तक स्त्री-मन और स्त्री जीवन का प्रश्न है, हमारे समाज में स्त्रियों की स्थितियों को मैंने कभी स्वयं महसूस किया, कभी अपने आसपास की स्त्रियों के जीवन में देखा. उनके मौन, संघर्ष, इच्छाओं और अनकही भावनाओं ने मुझे भीतर तक प्रभावित किया. शायद इसीलिए मेरी लेखनी में उनकी संवेदनाएँ अक्सर आती हैं.

प्रश्न 6. आप कविता के साथ-साथ संस्मरण, हाइकु और लेख भी लिखती हैं. इन विधाओं में से कौन-सी विधा आपके मन के सबसे करीब है और क्यों?
उत्तर: अगर सच पूछिए तो कविता मेरे दिल के सबसे करीब है. मुझे लगता है कि कविता सिर्फ शब्दों की अभिव्यक्ति नहीं होती. वह हमारे भीतर छिपी हुई बचपन की स्मृति व अनेक सुंदर और असुंदर पलों की साक्षी होती है या फिर कोई अनकहा संवाद. कभी-कभी कविता कोई ऐसी कल्पना होती है, जिसका शायद वास्तविक जीवन में पूरा होना संभव नहीं है. कविता ही वह विधा है, जिसमें कहानी, संस्मरण, संवाद, लेख और बहुत कुछ को कम शब्दों में कह देने का हुनर समाहित है. शायद इसलिए मैं कविता से इतना जुड़ाव महसूस करती हूँ. जो बात हम किसी से कह नहीं पाते, कविता उसे कह देती है. जिसे जीवन में जी नहीं पाते, कविता के माध्यम से जी लेते हैं.इसलिए मेरे लिए कविता केवल एक साहित्यिक विधा नहीं है, बल्कि मेरे मन की आवाज है.
प्रश्न 7. आज सोशल मीडिया के दौर में साहित्य तेजी से लोगों तक पहुँच रहा है, लेकिन साथ ही गहराई से पढ़ने की आदत कम होने की चिंता भी व्यक्त की जाती है. आप इस बदलाव को किस नजरिए से देखती हैं?
उत्तर: आज समय बहुत तेजी से बदल रहा है और लोगों के पास ठहरकर पढ़ने का समय कम होता जा रहा है. किताबें अब किंडल और स्क्रीन पर आ गई हैं. शब्द आँखों से पढ़े जाने के बजाय कानों से सुने जा रहे हैं.
सोशल मीडिया ने साहित्य को निश्चित रूप से एक व्यापक पहुँच तो दी है, परंतु गहराई से पढ़ने की आदत को कम कर दिया है. आज तकनीक इतनी उन्नत हो गई है कि वह हमारे मन की जिज्ञासाओं को भी पढ़ने लगी है. हम जिस विषय को खोज रहे होते हैं, जिस प्रश्न का उत्तर जानना चाहते हैं, उसी से जुड़ी कोई रील या लेख तुरंत हमारे सामने आ जाता है.हमें उत्तर मिल जाता है और हमारी खोज खत्म हो जाती है, लेकिन उस उत्तर तक पहुँचने की जो यात्रा पढ़कर पहुँचने की होनी चाहिए, वह समाप्त हो जाती है.हमें पढ़ने की आदत को हर हाल में बचाए रखना चाहिए, क्योंकि पढ़ना केवल जानकारी प्राप्त करना नहीं है, बल्कि यह मनुष्य के भीतर की संवेदनाओं, कल्पना और विचारों को जीवित रखता है.आज कहीं न कहीं इंसान मशीनों से लिखते-लिखते स्वयं भी मशीन बनने की ओर बढ़ रहा है. इसलिए तकनीक का विरोध नहीं, बल्कि उसका संतुलित उपयोग जरूरी है.
प्रश्न 8. आपने साहित्यकारों के साक्षात्कारकर्ता के रूप में भी संवाद किया है. जब आप किसी साहित्यकार का इंटरव्यू लेती हैं, तो ऐसा कौन-सा सवाल होता है, जो उनके व्यक्तित्व और रचनात्मकता की अनकही परतें खोल देता है?
उत्तर: हर साहित्यकार का अपना एक अलग व्यक्तित्व और अपनी संवेदनाओं को देखने-समझने का अलग नजरिया होता है. इसलिए मेरा मानना है कि किसी साहित्यकार के भीतर की अनकही परतों तक पहुँचने के लिए सवाल भी उसकी रचनात्मक दृष्टि को समझने वाला होना चाहिए.
कुछ साहित्यकार अत्यंत संवेदनशील होते हैं. समाज में घट रही घटनाएँ उन्हें भीतर तक प्रभावित करती हैं. उनके भीतर व्यवस्था के प्रति चिंता और कभी-कभी आक्रोश भी होता है. वे समाज में सुधार की आकांक्षा रखते हैं और ऐसे लोगों, घटनाओं या प्रयासों को अपनी रचनाओं का विषय बनाते हैं, जो समाज के सामने कोई सकारात्मक उदाहरण प्रस्तुत करते हैं. कई बार वे अपने निजी अनुभवों को भी उसमें पिरोकर ऐसी रचना करते हैं, जिसका उद्देश्य कहीं न कहीं समाज का भला करना होता है.
कुछ साहित्यकार अपनी संवेदनाओं को प्रकृति के माध्यम से अभिव्यक्त करते हैं. उनके लिए प्रकृति केवल सौंदर्य का विषय नहीं, बल्कि अपने भीतर के भावों और विचारों को कहने का एक सशक्त माध्यम होती है.

कुछ रचनाकार पौराणिक मान्यताओं और परंपराओं को अपनी रचनात्मकता का केंद्र बनाते हैं. वे उन्हीं प्रतीकों और कथाओं की ओट में अपने समय और अपने विचारों को अभिव्यक्त करते हैं. ऐसे साहित्यकार परंपरा में किसी भी तरह के बदलाव को लेकर अधिक संवेदनशील या आहत भी हो सकते हैं. इसलिए मैं किसी साहित्यकार से ऐसा सवाल पूछना पसंद करती हूँ, जो सीधे उसकी रचना पर नहीं, बल्कि यह जानने की कोशिश करे कि उसकी रचना के पीछे वह कौन-सी अनुभूति, घटना, विश्वास या बेचैनी है, जिसने उसे लिखने के लिए विवश किया.मुझे लगता है, यही सवाल उसके व्यक्तित्व और उसकी रचनात्मकता की उन परतों को खोलता है. हाँ, एक बदलाव मुझे आज के साहित्यिक परिवेश में दिखाई देता है. आज के कवियों में प्रसिद्धि पाने की आकांक्षा शायद उतनी प्रबल नहीं है, जितनी लगभग एक दशक पहले के कवियों में दिखाई देती थी. आज बहुत-से रचनाकार अपने कहे को अधिक महत्वपूर्ण मानते हैं, यानी प्रसिद्धि से अधिक अपनी बात को पाठक तक पहुँचाना उनके लिए मायने रखता है.

प्रश्न 9. एक एजुकेशनिस्ट, पोएट, टीचर ट्रेनर और एआईआर आर्टिस्ट के रूप में आपकी अब तक की यात्रा को देखते हुएआने वाले वर्षों में ममता सिंह खुद को किस नई भूमिका में देखना चाहती हैं? क्या कोई ऐसी पुस्तक या साहित्यिक परियोजना है, जिसका सपना आप पूरा करना चाहती हैं?
उत्तर: एजुकेशन का विस्तार अनंत है. मुझे लगता है कि अभी तक मैंने उसकी विशालता का शायद एक अंश ही जाना है या शायद उससे भी कम. आने वाले वर्षों में मेरी कोशिश होगी कि शिक्षा के इस अनुभव को और विस्तृत करूँ. विशेषकर उन बच्चों तक इसे पहुँचाऊँ, जो आज भी शिक्षा के अवसरों से वंचित हैं.मेरा विशेष ध्यान अंडरप्रिविलेज्ड बच्चों और मुख्यतः गर्ल चाइल्ड की शिक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ाने पर रहेगा. एक शिक्षक के रूप में मैंने समाज से जो कुछ पाया है, उसे अपने दायित्व को समझते हुए समाज को लौटाना चाहूँगी.
साहित्य में भी मेरी कुछ नया करने की तलाश जारी रहेगी. किसी नई विधा में काम करना और अपनी लेखनी को उन कोनों तक पहुँचाना, जहाँ मेरी बात अधिक स्पष्टता से समझी जाए. मेरी कोशिश होगी कि साहित्य केवल भटकाव का माध्यम न बने, बल्कि पाठक को कुछ क्षण ठहरकर सोचने, महसूस करने और स्वयं से संवाद करने के लिए प्रेरित करे. टीचर ट्रेनर के रूप में अपने अनुभवों को और निखारकर लेखन में शामिल करना चाहती हूँ और ऑल इंडिया रेडियो के माध्यम से भी कुछ नया सुनाने की कोशिश होगी.आगे चलकर इन सभी अनुभवों, विचारों और रचनात्मक यात्राओं को पुस्तक के रूप में प्रस्तुत करने का सपना है. मेरे लिए यह यात्रा किसी एक मंजिल तक पहुँचने की नहीं, बल्कि सीखते रहने की है. मेरा मानना है कि जिस तरह जीवन सतत है, उसी तरह सीखने की प्रक्रिया भी सतत है.
इन इंटरव्यू को भी पढ़िए
“मेरे भीतर अभी बहुत कुछ बाक़ी है” : किश्वर अंजुम
शब्दों से सपनों तक का सफर
रंगों में लोक, शब्दों में जीवन
डॉ. अनामिका दूबे ‘निधि’ : शब्दों से जीवन संवारने वाली
दहलीज से साहित्य शिखर तक
शब्दों की विहांगी : नीलम पेड़ीवाल
मधु मिश्रा : संवेदना की लेखिका
रीता मिश्रा तिवारी : शब्दों की साधिका
रुचि अग्रवाल : खामोश सपनों से बुलंदी का सफर
मौसमी चंद्रा: एक उर्जावान और संवेदनशील रचनाकार
एक लेखिका, एक मार्गदर्शक: विजया डालमिया
