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माँ के ये रुमाल

माँ की याद में संभालकर रखे पुराने रुमाल और माँ-बेटी के भावुक रिश्ते को दर्शाती हिंदी कविता कुछ पुराने रुमाल सिर्फ कपड़े के टुकड़े नहीं होते, उनमें माँ का स्पर्श, दुलार और पूरा बचपन बसा होता है।

अनुपमा भार्गव

एक लंबे अरसे से,
पूरे पैंतीस सालों से,
मैं नहीं रह पाती
अपनी माँ के साथ,
लेकिन वे हमेशा रहती हैं
मेरे पास, मेरे साथ।

उनकी यादों को
हमेशा साथ रखा है,
उनके कुछ रुमालों को
अपने पास रखा है।

दुःख में आँसू पोंछते हैं
माँ के रुमाल।
अधिक ख़ुशी से जब कभी
आँखें भर आती हैं तब,
धीरे-धीरे सहलाते हैं
माँ के ये रुमाल।

जब कभी थक जाती बहुत,
पसीना बह निकलता है,
धीरे से सहलाते, पुचकारते,
“कर्म ही जीवन है,
परिश्रमी बनो”, कह जाते,
सिखा जाते मेरी माँ के
ये नरम, मुलायम और
बहुत पुराने ये रुमाल।

इनके स्पर्श में पाती हूँ
अपनी माँ का दुलार
और ढेर सारा आश्वासन—
कि तुम अपना काम करो,
बाकी सब ईश्वर पर छोड़ दो।
जो कुछ बस में नहीं,
उसकी चिंता छोड़ दो।

तकिए के नीचे भी
रखा है माँ का एक रुमाल,
जो मुझे सुलाता,
मन उदास होने पर बहलाता,
देता सांत्वना और हिम्मत,
माँ के हरदम साथ होने का
अहसास कराता। 🌹

जाने क्यों ईश्वर ने
बेटियाँ बनाई और फिर
उनकी किस्मत में लिखी
माँ से जुदाई।
ये बात मुझे कभी
समझ न आई—
किसने ये ऐसी रीत चलाई?
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2 thoughts on “माँ के ये रुमाल

  1. अनुपमा जी
    बहुत सुंदर वर्णन किया आपने अपनी माँ के रुमालों का । …

    ” इनके स्पर्श में पाती हूँ
    अपनी माँ का दुलार
    और ढेर सारा आश्वासन—
    कि तुम अपना काम करो,
    बाकी सब ईश्वर पर छोड़ दो।
    जो कुछ बस में नहीं,
    उसकी चिंता छोड़ दो। ”
    यह मां की सलाह हर बेटी के लिए
    जीवन अमृत है ।

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