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भाई-बहन का रिश्ता

रक्षाबंधन पर भाई की कलाई पर राखी बाँधती और नोकझोंक करती बहन

सविता सिंह मीरा, जमशेदपुर

काफी वर्ष पहले की बात है और यह मेरी और मेरे भाई की सच्ची कहानी है।

राखी का दिन था। मैंने अपने भाई को बड़े प्यार से राखी बाँधी। राखी बाँधने के बाद उसने हँसते हुए कहा-

“कुछ भी पैसे नहीं दूँगा!”

पता नहीं उस समय मुझे क्या सूझा। मैंने उसके हाथ से राखी ही तोड़ दी और कहने लगी-

“जब पैसे नहीं दोगे, तो राखी क्यों मनाना? हम नहीं बाँधेंगे राखी। जाओ!”

वह भी कहाँ पीछे हटने वाला था। बोला-“जाने दो, हम भी ठीक-ठाक करके बोलेंगे कि तुम मेरी बहन नहीं हो!”

फिर थोड़ी देर रुककर हँसते हुए बोला-“लेकिन नहीं भी बोलेंगे, तो सारी दुनिया जानती है कि तुम मेरी बहन ही हो। बाँधो या मत बाँधो!”

मैंने कहा-“हाँ, सब जानते हैं कि तुम मेरे भाई हो और मैं तुम्हारी बहन।”

आज सोचती हूँ तो उस छोटी-सी बात पर हँसी आती है। कितनी मासूम थीं वे लड़ाइयाँ, कितनी सच्ची थीं वे नाराज़गियाँ! न मन में कोई गाँठ, न रिश्ते में कोई दूरी बस रूठना, चिढ़ाना, लड़ना और फिर उसी तरह साथ हो जाना।

आज जब रीलों या तस्वीरों में भाई-बहन के ऐसे ही नटखट किस्से देखती हूँ, तो अपना बचपन याद आ जाता है। चेहरे पर मुस्कान आ जाती है और मन फिर उसी पुराने दौर में पहुँच जाता है, जहाँ रिश्ते बहुत सरल थे और खुशियाँ बहुत छोटी-छोटी बातों में मिल जाती थीं।

शायद भाई-बहन का रिश्ता ऐसा ही होता है

बात-बात पर लड़ना,
पल भर में रूठना,
एक-दूसरे को चिढ़ाना,
और फिर बिना कुछ कहे
उसी अपनापन में लौट आना।

रिश्ते उम्र के साथ बदलते नहीं, बस उनकी शरारतें यादों में बदल जाती हैं।

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