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ऐ ज़िंदगी…

ऐ ज़िंदगी… तू क्यों इतनी शरारतें है करती?

मनीषा मारु, विराटनगर, नेपाल

ऐ ज़िंदगी…
तू क्यों इतनी शरारतें है करती?

कभी ममतामयी माँ बनकर खूब लाड़ लड़ाती,
तो कभी पिता बन संघर्षों से लड़ना सिखाती।

ऐ ज़िंदगी…

कभी खुशियों की चाशनी में डुबकी लगवाती,
तो कभी ग़मों के गलियारों में काँटे चुभाती।

ऐ ज़िंदगी…

कभी आसमान के शून्य को समझने की चाह जगाती,
तो कभी धरा के कोलाहल से मेरा मुझसे ही द्वंद्व करवाती।

ऐ ज़िंदगी…

कभी हालातों से लड़ने की हिम्मत बँधाती,
तो कभी उम्मीदों के घरौंदों पर पानी फेर जाती।

ऐ ज़िंदगी…

कभी अपनों के बीच ही बगावत करवाती,
तो कभी दिल की धड़कनें गैरों पर ही मर मिटती।

ऐ ज़िंदगी…

कभी परछाईं बन हमराही-सी साथ निभाती,
तो कभी तन्हाई में भी हाथ छुड़ाकर भाग जाती।

ऐ ज़िंदगी…

कभी पहेली बन सवालों की पोटली थमा जाती,
तो कभी एक ही इशारे में सारे राज़ को समझा जाती।

ऐ ज़िंदगी…

हर मोड़ पर आईना बनकर मुझे स्वयं से मिलती,
तो कभी आत्मा की धूनी में रमे परमात्मा से मेरा मौन संवाद भी है करवाती।

ऐ ज़िंदगी, तेरी हर शरारतों के पीछे कोई-न-कोई सबक़ छिपा होता है।

अब समझ आई तेरी ये अदा—
मेरे रास्तों में तू काँटे नहीं, मेरे हौसलों के पुष्प बिछाती है।
विपरीत परिस्थितियों के अनुभव से जीने की नई वजह सिखाती है।

टूटकर गिरना, गिरकर बिखरना और बिखरकर,
खुद से खुद को मुस्कुराकर सँवरना सिखाती है।

ऐ ज़िंदगी…
अब शिकायत नहीं तुझसे, ना ही तेरी शरारतों से,
हर बार ही ठोकर से उठा मुझसे मेरे जीत का जश्न जो मनवाती है।

लेखिका के बारे में


मनीषा मारू
एक ऐसा नाम, जिसमें शब्द केवल अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि जीवन के अनुभवों की धड़कन बनकर उतरते हैं। विराटनगर, नेपाल की यह संवेदनशील लेखिका एवं कवयित्री अपने आसपास की दुनिया को बेहद सहजता से देखती हैं और उसी सहजता को शब्दों में ढालकर पाठकों के मन तक पहुँचाती हैं।
लेखन के प्रति उनका अनुराग स्कूल जीवन से ही रहा। जीवन ने उन्हें अनेक भूमिकाएँ दीं. कंप्यूटर शिक्षिका, गृहिणी और अब एक सक्रिय साहित्य-साधक की। हर भूमिका को पूरी शिद्दत से निभाते हुए उन्होंने अपने भीतर के रचनाकार को कभी मौन नहीं होने दिया। विपरीत परिस्थितियों को चुनौती मानकर स्वीकार करना और हर अनुभव से कुछ नया सीखना उनके व्यक्तित्व की विशेष पहचान है।
‘कुमकुम लगे पाँव’ उनका प्रथम काव्य-संग्रह है, जिसमें जीवन के विविध रंग प्रेम, रिश्ते, संवेदना, संघर्ष, प्रकृति, स्त्री-मन और मानवीय भावनाएँ—कविता के रूप में आकार लेते हैं। उनकी कविताएँ किसी बनावटी अलंकरण की तलाश नहीं करतीं; वे सीधे मन से निकलती हैं और पाठक के मन में अपना घर बना लेती हैं।

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