
सुरेश परिहार, पुणे
हाँ…
मैंने देखा था उसे
गीले बालों में…
जैसे कोई बारिश
अपनी पूरी उम्र
उसके कंधों पर सुखाने रख गई हो।
कुछ बूँदें अब भी
उसकी ज़ुल्फ़ों से लटक रही थीं,
मानो बादल
विदा लेते-लेते
अपनी आख़िरी चिट्ठियाँ
वहीं भूल गए हों।
आईने के सामने
वह खड़ी थी…
लेकिन शायद
वह ख़ुद को नहीं देख रही थी।
कुछ चेहरे
आईने में नहीं,
यादों में सँवरते हैं।
उसकी मुस्कुराहट
शीशे पर नहीं ठहरी,
कमरे की दीवारों पर जाकर
धीरे-धीरे खिलने लगी…
जैसे धूप
खिड़की से उतरकर
फ़र्श पर
अपना नाम लिखती हो।
उसने काजल उठाया…
और आँखों के किनारे
एक बारीक-सी नदी बहा दी।
इतनी पतली…
कि अगर कोई ग़म
उधर से गुज़रता,
तो भीगकर
शायद लौट जाता।
फिर होंठों पर
बस एक हल्की-सी रंगत रखी उसने…
जैसे गुलाब
सुबह की पहली किरण को
धीरे से छू ले।
दोनों होंठ
एक-दूसरे से मिले…
कोई आवाज़ नहीं हुई,
बस रंग ने
अपने हिस्से की दूरी
चुपचाप तय कर ली।
मैं सोचता रहा…
क्या सचमुच
यही था उसका श्रृंगार?
न कोई चमकदार गहना,
न चेहरा बदल देने वाली
रंगों की भीड़।
सिर्फ़…
गीले बाल,
काजल की एक पतली-सी लकीर,
होंठों पर ठहरी
एक मासूम-सी मुस्कान,
और आँखों में
किसी का इंतज़ार।
बाक़ी जो था,
वह किसी बाज़ार में नहीं मिलता।
वह उसकी सादगी थी,
जो इत्र की तरह
बिना छुए
आस-पास फैल जाती थी।
वह उसकी ख़ामोशी थी,
जो बोलती कम,
सुनाई ज़्यादा देती थी।
वह उसकी आँखें थीं,
जिनमें हर शाम
आकर अपना घर बना लेती थी।
तब समझ आया…
औरत का सबसे सुंदर श्रृंगार
काजल नहीं होता,
लिपस्टिक भी नहीं,
न ही कानों में झूलती बालियाँ।
उसका सबसे सुंदर श्रृंगार
वह सुकून होता है,
जो उसे देखकर
किसी और के भीतर
धीरे-धीरे उगने लगता है।
कुछ ख़ूबसूरत लोग
सजते नहीं…
वे बस
अपनी सादगी पहन लेते हैं।
और फिर…
दुनिया भर की रोशनियाँ
उनके चेहरे से
उधार माँगने लगती हैं।
इन रचनाओं को भी पढ़ें-
अधूरी मुलाक़ात
अमर मित्रता
मेरी ताक़त, मेरे दोस्त
अनुपमा जैसी दोस्त ने मुझे बनाया लेखिका
दोस्ती की वह छांव, जहां पूरा मोहल्ला एक परिवार बन गया
कुछ मित्र जीवन होते हैं
“तेरे बिना ज़िंदगी से कोई शिकवा तो नहीं…”

One thought on “काजल, ख़ामोशी और तुम”