आज़माए को आज़माते हो

रिश्तों में धोखे और तन्हाई की भावना को दर्शाती एक भावनात्मक हिंदी-उर्दू ग़ज़ल की प्रतीकात्मक तस्वीर रिश्तों में धोखे और तन्हाई की भावना को दर्शाती एकतस्वीर

अलका अग्रवाल, भोपाल

आज़माए को आज़माते हो,
यार, धोखे पे धोखा खाते हो।।

ख़ूब हमदर्दियाँ जताते हो,
वक़्त आने पे मुँह छुपाते हो।।

अपने ज़ख़्मों पे मुस्कुराकर के,
हम पे ही तीर क्यों चलाते हो।।

इतना ख़ामोश रहना ठीक नहीं,
क्यों हमें ऐसे आज़माते हो।।

दास्ताँ हम तुम्हारी सुन लेते,
हाल-ए-दिल कहाँ बताते हो।।

ज़िक्र रहता ज़ुबान पर मेरा,
और मुझको ही भूल जाते हो।

हाथ की जो लकीरों में है लिखा,
याद क्यों तुम मुझे दिलाते हो।।

गहरे पानी में आज, दीवानो,
नाव काग़ज़ की तुम चलाते हो।।

आँसुओं से ज़मीन सींची, “राज़”,
रेगज़ारों में गुल खिलाते हो।।

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