
सविता सिंह मीरा,जमशेदपुर
“नंदिनी… ओ नंदिनी! कितनी देर पहले चाय के लिए कहा था। कहाँ हो तुम?”
निखिल की आवाज़ पूरे घर में गूँज उठी।
कुछ क्षण बाद नंदिनी आई। उसने चुपचाप मेज़ पर चाय का कप रखा और बिना कुछ कहे लौट गई।
निखिल कप उठाते हुए बुदबुदाया, “पता नहीं, आजकल इसे क्या हो गया है। हर समय कहीं खोई-खोई रहती है।”
उसकी नज़र दरवाज़े की ओर उठी, जहाँ नंदिनी अभी-अभी ओझल हुई थी।
कुछ तो बदल गया था।
नंदिनी पहले ऐसी नहीं थी।
वह केवल उसकी पत्नी ही नहीं, एक प्रतिष्ठित लेखिका भी थी। शब्द जैसे उसके इशारों पर नाचते थे। उसकी कविताएँ लोगों के दिलों में उतर जाती थीं। उसके असंख्य प्रशंसक थे।
परंतु विवाह के बाद धीरे-धीरे उसने लिखना छोड़ दिया था।
कारण?
निखिल का प्रेम तो उसे मिला, लेकिन उसकी सफलता से उपजी एक अदृश्य असहजता भी साथ मिली।
जब भी कोई नंदिनी की प्रशंसा करता, उसकी लेखनी की चर्चा करता या उसके साथ तस्वीर खिंचवाने को उत्सुक होता, निखिल के चेहरे पर एक अनकही बेचैनी उतर आती।
और नंदिनी ने वह बेचैनी पढ़ ली थी।
धीरे-धीरे उसने अपने शब्दों का गला घोंट दिया।
लेखन छूटा।
मंच छूटे।
लोग छूट गए।
और फिर…
वह स्वयं भी कहीं छूट गई।
एक दिन निखिल ने पूछा,
“क्या बात है, नंदिनी? तुम इतनी चुप क्यों रहने लगी हो?”
नंदिनी मुस्करा भर दी।
“कुछ नहीं।”
निखिल संतुष्ट नहीं हुआ। उसने अपनी माँ को पुकारा—
“माँ! आपने कुछ कहा है क्या नंदिनी को? यह आजकल बहुत चुप रहने लगी है।”
माँ ने आश्चर्य से कहा—
“मैं क्यों कुछ कहूँगी? बहू तो मेरा इतना ध्यान रखती है कि कभी शिकायत का अवसर ही नहीं देती।”
फिर कुछ रुककर बोलीं—
“लेकिन बेटा, बहू के मन में क्या है, यह तुझे समझना चाहिए।”
माँ चली गईं और पहली बार उनके शब्द निखिल के भीतर कहीं अटक गए।
उधर नंदिनी सोच रही थी—
“क्या सचमुच इन्हें नहीं पता कि मैं क्यों मौन हूँ?”
“अगर समझना होता तो अब तक समझ चुके होते…”
शाम को निखिल फिर पूछ बैठा—
“नंदिनी, आखिर बात क्या है?”
इस बार नंदिनी ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा—
“फर्क पड़ता है मेरी चुप्पी से तुम्हें?”
“हाँ, बहुत।”
नंदिनी हल्का-सा मुस्कराई।
“तो सुनो… मौन हूँ मैं।”
“क्यों?”
“क्योंकि संयम की सारी दीवारें मेरे लिए ही बनाई गई हैं और अब उन्हीं दीवारों के भीतर रहना सीख लिया है मैंने।”
निखिल कुछ समझ नहीं पाया।
उसके लिए सब तो सामान्य था।
नंदिनी उसका पूरा ध्यान रखती थी, उसकी पसंद का भोजन बनाती थी, घर संभालती थी।
फिर समस्या कहाँ थी?
उस रात नंदिनी करवट बदलकर लेट गई, पर नींद नहीं आई। अतीत के दरवाज़े खुल गए।
पाँच वर्ष पीछे…
एक विशाल कवि सम्मेलन।
मंच संचालक की आवाज़ गूँज रही थी—
“अब हमारे बीच आ रही हैं सुप्रसिद्ध कवयित्री नंदिनी, जिनकी रचनाएँ सीधे हृदय को स्पर्श करती हैं…”
तालियों की गड़गड़ाहट से पूरा सभागार भर उठा।
नंदिनी ने कविता पढ़नी शुरू की।
लोग मंत्रमुग्ध थे।
कार्यक्रम समाप्त होते ही श्रोताओं की भीड़ उमड़ पड़ी।
“मैम, एक तस्वीर!”
“मैम, आपका ऑटोग्राफ!”
“मैं आपका बहुत बड़ा प्रशंसक हूँ।”
उसी भीड़ में एक युवक भी था—निखिल।
जो धीरे-धीरे नंदिनी की कविताओं से प्रेम करते-करते नंदिनी से ही प्रेम करने लगा। फिर दोनों का विवाह हो गया।
शुरुआती दिन बहुत सुंदर थे।
पर धीरे-धीरे कुछ बदलने लगा।
एक दिन सड़क पर एक प्रशंसक दौड़ता हुआ आया।
“मैम, बस एक ऑटोग्राफ!”
नंदिनी मुस्कराई ही थी कि निखिल ने उसका हाथ पकड़कर लगभग खींचते हुए कार में बैठा दिया।
उस दिन पहली बार नंदिनी ने उसके चेहरे पर प्रेम नहीं, असुरक्षा देखी थी।
और उसी दिन उसके भीतर कुछ टूट गया था।
वर्तमान में लौटकर नंदिनी बोली—
“सुनो, निखिल…”
“हूँ।”
“जब तुम्हें किसी समारोह में मुख्य अतिथि बनाकर बुलाया जाता है, जब मीडिया तुम्हारा इंटरव्यू लेती है, जब लोग तुम्हारे साथ तस्वीर खिंचवाने को उत्सुक होते हैं… तब तुम कितने खुश होते हो, देखा है मैंने।”
निखिल चुप था।
“मैं भी वही खुशी महसूस करती थी।”
उसकी आवाज़ काँप गई।
“लेकिन तुम्हें मेरी वह खुशी पसंद नहीं थी।”
“जब लोग मेरी लेखनी की प्रशंसा करते थे, मेरे हस्ताक्षर लेने के लिए उत्साहित होते थे… तब तुम्हारा चेहरा बदल जाता था।”
“इसलिए मौन हूँ मैं।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
“तुम्हारे सम्मान पर मुझे गर्व है, निखिल। इसलिए नहीं चाहती थी कि लोग कभी तुम्हें उस व्यक्ति के रूप में देखें जिसने अपनी पत्नी के सपनों का गला घोंट दिया।”
“मैं डरती नहीं हूँ।”
“मैं कठपुतली भी नहीं हूँ।”
“बस… मैं ‘मैं’ से अधिक ‘हम’ को बचाना चाहती थी।”
निखिल के पास कोई उत्तर नहीं था।
उस रात पहली बार उसे अपनी गलती का भार महसूस हुआ।
अगले ही दिन उसने एक निर्णय लिया।
कुछ दिनों बाद एक भव्य प्रेस कॉन्फ़्रेंस आयोजित की गई।
पत्रकारों, संपादकों और साहित्यकारों से सभागार भरा हुआ था।
नंदिनी को समझ नहीं आ रहा था कि यह सब क्यों हो रहा है।
कार्यक्रम शुरू हुआ।
पहला प्रश्न आया—
“नंदिनी जी, आपने लिखना क्यों छोड़ दिया? आपकी रचनाएँ समाज की धरोहर थीं।”
नंदिनी मौन रही।
उसकी निगाह निखिल पर टिक गई।
तब निखिल उठ खड़ा हुआ।
उसने माइक्रोफोन संभाला और पहली बार सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया—
“इस प्रश्न का उत्तर मैं दूँगा।”
पूरा सभागार शांत हो गया।
“नंदिनी ने लिखना इसलिए नहीं छोड़ा कि उसके पास शब्द नहीं थे।”
“उसने इसलिए छोड़ा क्योंकि मैं उसके शब्दों से डर गया था।”
एक क्षण के लिए सब स्तब्ध रह गए।
निखिल बोलता रहा—
“मैं उससे प्रेम करता था, लेकिन उसकी लोकप्रियता से नहीं।”
“जब लोग उसकी प्रशंसा करते थे, मेरा अहं आहत हो जाता था।”
“मैंने कभी उसे रोका नहीं, लेकिन इतना असहज अवश्य कर दिया कि उसने स्वयं अपने सपनों को बंद कर दिया।”
“और यह मेरी सबसे बड़ी भूल थी।”
उसकी आँखें भर आईं।
“आज मैं सबसे पहले नंदिनी से क्षमा माँगता हूँ।”
वह मंच से उतरकर उसके सामने हाथ जोड़कर खड़ा हो गया।
“मुझे माफ़ कर दो।”
नंदिनी की आँखों से आँसू बह निकले।
उसका कंठ भर आया। शब्द साथ छोड़ गए।
निखिल मुस्कराया।
“माँ ने मुझे समझाया था।”
“उन्होंने कहा था- याद करो, जब वह लिखती थी तो कितनी खुश रहती थी।”
“आज की यह प्रेस कॉन्फ़्रेंस भी उन्हीं का विचार है।”
फिर उसने पूछा
“अब भी मौन रहोगी, नंदिनी?”
नंदिनी सचमुच मौन थी।
लेकिन आज यह मौन पीड़ा का नहीं था।
यह भावनाओं का था।
यह उस प्रेम का था जिसने अंततः अहंकार पर विजय पा ली थी।
उसकी आँखों से बहते आँसू वर्षों के सारे विषाद अपने साथ बहा ले गए।
आज वह चुप थी, पर उसकी चुप्पी का अर्थ बदल चुका था।
और पहली बार…
निखिल उसकी खामोशी को समझ गया था।हाँ, नंदिनी मौन थी—
लेकिन अब उसका मौन पराजय नहीं, सम्मान, प्रेम और पुनर्जन्म की भाषा बन चुका था।
उस रात नंदिनी ने बहुत दिनों बाद अपनी पुरानी डायरी खोली।
पहला पन्ना खाली था।
उसने कलम उठाई।
कुछ देर तक पन्ने को देखती रही।
फिर लिखा—
“मैं मौन थी, क्योंकि मेरे शब्दों का सम्मान नहीं था।
आज फिर लिख रही हूँ, क्योंकि मेरे मौन को समझ लिया गया है।”
खिड़की के बाहर भोर उतर रही थी।
और भीतर…
एक कवयित्री फिर जन्म ले रही थी।
