
डॉ. रत्ना मानिक, टेल्को, जमशेदपुर
मेरे अंदर का शोर
बार-बार विचलित करता है मुझे
वो झकझोरता है मुझे
मैं जीवित हूं या मृत
इस शंका से
वो बार-बार धिक्कार कर
चेतन,सक्रिय और उपजाऊ
कर्म हेतु
प्रेरित करता है मुझे
पर मैं
निष्क्रिय…
निर्जीव …
चेतना शून्य सी…
बिछावन पर पड़े-पड़े
ताकती हूं उस पंखे को
जिसके पतले से रॉड में
न जाने कितनी असफलताएं
न जाने कितनी ग्लानियां
न जाने दर्द की
कितनी कहानियां
रेशमी फंदों से
कुसमय ही झूल गई होंगी
कोमा में गए मरीज़ की तरह
मेरी आँखें सब कुछ देखती हैं
चीख़-चीख़ कर
मौजूदा व्यवस्था को
ज़बान की गोलियों से
छलनी करती हैं
पर मेरे भीतर का शोर
बाहर के कोलाहल से मिलकर
खो जाता है कहीं
ठीक वैसे ही
जैसे मिट्टी की तपती दरारों में
डाला गया पानी
गुम हो जाता है कहीं
भीतर का शोर
व्यथित करता है मुझे
छत की वो कातिल मुंडेर
मेरी आत्मा को
झकझोरती हैं
जहां से युवा सपनों ने
अनंत आकाश में
विलीन होने का
अंतिम निर्णय लिया होगा
आँखें बेसाख्ता बरसती हैं
मन में झंझावातों का
तूफानी खेल चलता है
एक विद्रूप सी हँसी
होठों के किनारों को
ज़रा सा फैला देती है
जब कानों में गूंजता है
“हम अपने देश की युवा शक्ति को
सशक्त बनायेंगे
राष्ट्र को भ्रष्टाचार मुक्त बनाएंगे
बेटियों को पढ़ाएंगे
उनकी रक्षा का
हर फर्ज़ निभाएंगे
और
पर्दे के पीछे से आवाज़ आती है
“मुफ़्त राशन पानी और रुपईया बांट कर
युवा शक्ति को
आजीवन पंगु बनाएंगे
नौकरियों का स्वप्न दिखलाकर
पर्चा लीक कराएंगे
नशे में बेकाबू
वहशी गाड़ियों में
स्त्री शील की
सरेआम धज्जियां उड़ाएंगे”
किंतु जवान आंखों में
अब भी उम्मीद बाकी है
अच्छे दिन आने के
वे सपने सजायेंगे
अच्छे दिन आने के
वे सपने सजायेंगे …
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Bahut accha
ओह अद्भुत! भाव, शब्द चयन ,अभिव्यक्ति👌👌