युवा पीड़ा, सामाजिक निराशा और भीतर के शोर को दर्शाती भावनात्मक हिंदी कविता का दृश्य

पंगु

‘पंगु’ केवल एक कविता नहीं, बल्कि भीतर दबे शोर, सामाजिक विडंबना, युवा असंतोष और व्यवस्था पर तीखा प्रश्न है। इसमें बेरोजगारी, टूटते सपने, स्त्री असुरक्षा और राजनीतिक वादों के बीच जूझती पीढ़ी की बेचैनी मुखर होकर सामने आती है।

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फ़र्क

एक पल में तान्या का भरोसा टूट गया और माँ दुर्गा जाग उठीं। जिस चेहरे को उसने पिता का रूप मान लिया था, वही चेहरा बच्चों की सुरक्षा पर सवाल बन गया। उस दिन उसे समझ आया—रिश्ता होना और रिश्ता दिखना, दोनों में ज़मीन-आसमान का फ़र्क होता है।

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