एक बिंदु से ही अर्थ में परिवर्तन

सुमित्रा गुप्ता सखी कल्याण, मुम्बई (महाराष्ट्र)
हर व्यक्ति जानता है कि शब्दों का कितना महत्व होता है। एक छोटी-सी मात्रा भी उनके अर्थ को पूरी तरह बदल सकती है। “चिंता” और “चिता” ऐसे ही दो शब्द हैं—दिखने में लगभग समान, पर अर्थ में अत्यंत भिन्न। एक जीवित मनुष्य को भीतर ही भीतर जलाती है, और दूसरी मृत्यु के बाद शरीर को भस्म कर देती है।
संत कबीर दास ने कहा है—
“चिंता ऐसी डाकिनी, काटि कलेजा खाय;
वैद्य बिचारा क्या करे, कहाँ तक दवा लगाय।”
वास्तव में, चिंता एक ऐसी अदृश्य अग्नि है जो मन, बुद्धि और शरीर को भीतर से जला देती है। यह केवल एक भावना नहीं, बल्कि एक मानसिक अवस्था है, जिसमें व्यक्ति भविष्य की आशंकाओं में उलझकर वर्तमान को खो देता है। वह या तो बीते हुए कल पर पछताता है, या आने वाले कल से भयभीत रहता है, और इस प्रक्रिया में आज का सुख, शांति और संतुलन नष्ट हो जाता है।
आज के युग में यह समस्या और भी गहरी हो गई है। करियर का दबाव, आर्थिक असुरक्षा और विशेष रूप से सामाजिक तुलना तथा डिजिटल माध्यमों का प्रभाव, ये सब मिलकर मनुष्य को निरंतर चिंता में डाले रखते हैं। परिणामस्वरूप, जीवन की सहजता और स्वाभाविक आनंद कहीं पीछे छूट जाता है।
इसके विपरीत, चिता जीवन का अंतिम सत्य है। वह केवल एक दिन जलती है और निर्जीव शरीर को भस्म कर देती है। उसमें पीड़ा नहीं होती। परंतु चिंता—वह जीवन भर जलाती है, और हर दिन जलाती है। सूक्ष्म दृष्टि से देखें तो चिंता, चिता की पूर्व तैयारी के समान है। जो व्यक्ति निरंतर चिंता में डूबा रहता है, वह न स्वयं शांति से जी पाता है और न दूसरों को जीने देता है। उसके चेहरे की रेखाएँ, वाणी की कठोरता और व्यवहार की अस्थिरता सब चिंता की ही उपज होती हैं। धीरे-धीरे शरीर रोगों का घर बन जाता है और जीवन-ऊर्जा क्षीण होने लगती है।
इसका मूल कारण यह है कि मनुष्य स्वयं को हर कार्य का कर्ता और परिणामों का स्वामी मान बैठता है। जब वह सफलता-असफलता, मान-अपमान और भविष्य की अनिश्चितताओं का भार अपने ऊपर ले लेता है, तब चिंता स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होती है। इसके विपरीत, जो व्यक्ति अपना कर्तव्य करता है और फल को ईश्वर या प्रकृति पर छोड़ देता है, वह अपेक्षाकृत शांत और संतुलित रहता है।
चिंता से मुक्ति का मार्ग कठिन नहीं, परंतु यह निरंतर अभ्यास की मांग करता है। इसके लिए व्यक्ति को वर्तमान में जीने की आदत विकसित करनी होती है, अपनी अपेक्षाओं को सीमित करना होता है और आत्मविश्वास को सुदृढ़ बनाना होता है। जब मनुष्य जीवन को स्वीकार करना सीखता है, तब उसके भीतर शांति का उदय होने लगता है। इसके साथ ही, प्रतिदिन कुछ समय ध्यान या प्राणायाम करना, समय-समय पर डिजिटल उपकरणों से दूरी बनाना, सकारात्मक चिंतन और कृतज्ञता का अभ्यास करना, तथा निःस्वार्थ सेवा और प्रार्थना में मन लगाना ये सभी उपाय चिंता की अग्नि को शांत करने में जल के समान कार्य करते हैं। धीरे-धीरे इनका प्रभाव मन पर स्पष्ट दिखाई देने लगता है और व्यक्ति आंतरिक संतुलन तथा प्रसन्नता का अनुभव करता है।
अंततः यह समझना आवश्यक है कि चिता एक दिन सभी के लिए निश्चित है परंतु चिंता करना या न करना हमारे अपने हाथ में है। जो व्यक्ति चिंता से ऊपर उठ जाता है, वही वास्तव में जीवन को जी पाता है; अन्यथा लोग केवल श्वासों की गिनती करते रहते हैं।
संतों ने बार-बार यही संदेश दिया है. चिंता मत करो, चिंतन करो।” किंतु मनुष्य अक्सर चिंता छोड़ नहीं पाता और जन्म से मृत्यु तक किसी न किसी उलझन में फँसा रहता है। धन्य हैं वे लोग, जो अपनी चिंताओं को ईश्वर के चरणों में समर्पित कर देते हैं और जीवन को सहज भाव से स्वीकार करते हैं।
कबीर का एक और वचन इस संदर्भ में अत्यंत प्रेरणादायक है.
“कबिरा खड़ा बाजार में, लिए लकुटिया हाथ;
जो घर फूँके आपना, चले हमारे साथ।”
यहाँ “घर फूँकना” अहंकार और आसक्ति का त्याग है—पर यह साहस हर किसी में नहीं होता। इसलिए मनुष्य को अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए ईश्वर का स्मरण करते रहना चाहिए।
मेरे शब्दों में—
“हृदय में चिंतन को स्थान दो, जीवन को नव आकार मिलेगा;
चिंतन मन को निखारता है
चिंता उसे चिता तक ले जाएगा।”
आज के समय में अत्यधिक चिंता मानवता को अनेक रोगों की ओर धकेल रही है। यह दीमक की भाँति शरीर और मन को भीतर से खोखला कर देती है। इसलिए हमें इससे ऊपर उठने का प्रयास करना चाहिए, क्योंकि मानव जीवन अत्यंत दुर्लभ और मूल्यवान है। संत तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में भी कहा है—
“बड़े भाग मानुस तन पावा,
सुर दुर्लभ सब ग्रंथन गावा।”
सनातन परंपरा में अनेक ऐसे ग्रंथ हैं, जो जीवन की समस्याओं का समाधान प्रदान करते हैं। यदि उन्हें पढ़ने का समय न हो, तो भी ईश्वर के नाम का स्मरण, जप और ध्यान जीवन में शांति और संतुलन ला सकता है। चलते-फिरते, उठते-बैठते, कार्य करते हुए भी यदि मन में स्मरण बना रहे, तो धीरे-धीरे चिंता स्वतः ही कम होने लगती है।
अतः यदि हम जीवन को शांत, सुंदर और सार्थक बनाना चाहते हैं, तो हमें चिंता से दूरी बनानी होगी—क्योंकि चिंता जीवन को समय से पहले जला देती है, जबकि चिता अपना कार्य अंत में ही करती है।
अंत में
चिता अंत में जलाती है,
चिंता जीवन भर जलाती है।
इसलिए
चिंता से चिंतन की ओर बढ़ें ईश्वर का नाम स्मरण अधिक से अधिक करें और मानव जीवन को सफल तथा सार्थक बनाएं।
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चिंता और चिता
एक बिंदु से ही अर्थ परिवर्तन
यही हिंदी भाषा की विशेषता है।
इन्हीं भावों को लेखिका ने इस लेख में संजोया है