धागों से परे

कठपुतलियों के माध्यम से प्रेम और एहसासों को दर्शाती भावनात्मक हिंदी कहानी का दृश्य

कठपुतलियों, प्रेम और एहसासों की मार्मिक कहानी

विजया डालमिया, हैदराबाद

ख्यालों के बादल उड़ चले, जहाँ ठहरा था मन,
यादों के पक्के धागों से बंधा बैठा था कठपुतली बन।

“बोल रे कठपुतली, डोरी कौन संग बांधी, झूमे-नाचे तू किसके लिए…?”
जैसे ही यह आवाज कानों में पड़ती, रूप दौड़कर कठपुतली का प्रोग्राम देखने के लिए वहां पहुंच जाती, जहाँ रंग-बिरंगी कठपुतलियाँ किसी और के इशारों पर नाच रही होतीं। उन्हें देखकर वह सपनों में खो जाती। रंग-बिरंगे कपड़े पहन नृत्य करता जोड़ा उसे बहुत लुभाता। उनकी आँखों की और हाथ-पैरों की मटकन में वह खुद को पाती। जितने दिन तक कठपुतली का प्रोग्राम चलता, उसका कहीं और दिल नहीं लगता। प्रोग्राम होने के बाद भी वह जाने क्या सोचती, वहीं बैठी रहती।

एक दिन गौतम से रहा नहीं गया… “गौतम”, जो कठपुतलियाँ अपने इशारों पर नचाता था, कहने लगा—कठपुतली का प्रोग्राम खत्म हो चुका है।

उसकी बात सुनकर रूप ने कहा—”आप यह इतनी सुंदर-सुंदर कठपुतलियां कहां से लाते हो?”

“कहीं से नहीं, इन्हें मैं बनाता हूँ। ये सब मेरे बच्चों की तरह हैं। देखो, ये है ‘रंगीली’ और ये ‘शहजादा’…”

“अच्छा, तो ये शहजादा है! तभी मुझे इतना भाता है…”

“हां, तुम भी किसी शहजादी से कम थोड़ी हो…”

“लेकिन आप हमेशा यहाँ क्यों नहीं रहते, और आपके घर के बाकी लोग कहाँ हैं…?”

गौतम बचपन से ही अनाथ था। तभी तो ये कठपुतलियाँ ही उसकी दुनिया बन गई थीं, जिनमें से रंगीली और शहजादा उसके प्रिय किरदार थे। अपनी रूपमती से बिछड़े उसे जमाना हो गया था, और जमाने ने ही तो रूपमती को उससे दूर किया था, क्योंकि उसका कोई नाथ नहीं था।

रूपमती कब, कैसे उसके दिल की धड़कन बन गई, वह समझ नहीं पाया। जब भी वह कठपुतली बनाता, वह उसे छुपकर, खामोशी से देखा करती। एक दिन गौतम ने उसकी चोरी पकड़ ली, तो वह सकपकाई-सी इधर-उधर देखने लगी।

तभी यादों के गलियारे में रूपमती की आवाज गूंजने लगी—

“यह सब इतनी सुंदर-सुंदर कैसे बनाते हो…?”

“पहले यहाँ आओ, तब बताऊंगा…”

रूपमती अपनी लंबी-सी चोटी और लहंगे को संभालती हुई पास आ खड़ी हुई। उसकी मोटी-मोटी आंखें सवाल पूछने लगीं—”अब बताओ, ये इतनी सुंदर कैसे बनाईं?”

“तुम भी तो सुंदर हो…”

“अच्छा! तो फिर मेरे जैसी कठपुतली बनाओ ना…”

“पहले यह तो बताओ, तुम्हारा नाम क्या है?”

“मैं रूपमती!”

“तभी तुम इतनी सुंदर हो…!”

“तुम भी तो शहजादे की तरह दिखते हो…”

“अच्छा! मुझे नहीं पता, कभी किसी ने कहा नहीं…”

“मैं जो कह रही हूँ…” कहकर रूपमती अपनी चोटी घुमाने लगी। वह मुस्कुरा दिया।

अब तो रोज ही रूपमती उसके पास आकर बैठ जाती। दोनों मिलकर खूब बातें करते। बातों के साथ-साथ रूपमती उसकी मदद भी करने लगी, कठपुतली सजाने में। पर सबसे सुंदर कठपुतली रूपमती ने ही बनाई। नाम दिया—“शहजादा”।

यौवन भी समय के साथ बढ़ा, और नजदीकी का अंत नहीं था, पर रूपमती के लिए यही यौवन दुश्मन बन गया, जब घरवालों ने उसका ब्याह किसी और से करवा दिया। पहली बार गौतम को लगा, जैसे वह फिर से अनाथ हो गया। रूपमती सबके होते हुए भी एक असहाय और अनाथ की तरह विदा हो गई।

टकटकी बांधे वह उसे जाते देखता रहा, पर वह जाकर भी उसके भीतर ही रह गई। दिल में बसने वाले कभी कहाँ जाते हैं—जहाँ जाते हैं, खुद को छोड़ जाते हैं। यही हाल मेरा था। आँखें शायद पहली बार बगावत पर उतरी थीं, जिन्हें तलाश थी उस आंचल की, जो लहराता हुआ उसे याचना भरी नजरों से देख रहा था।

पर वह जानता था—रूपमती की बेबसी और खुद की लाचारी। रूपमती की शान पर कोई बात आने से पहले ही वह वहां से चल पड़ा—रंगीली और शहजादे को साथ लेकर। हवाएं भी पराई हो जाती हैं, जब कोई अपना बिछड़ जाता है।

“आप क्या सोच रहे हैं…?”
सुनते ही मैं चौंका और लौट आया आज की दुनिया में।

“कुछ नहीं…”

“कुछ कैसे नहीं? आपकी तो आँखों से आँसू बह रहे हैं…”
कहते हुए उसने अपने रूमाल से मेरे आँसू पोंछ दिए। एक पल के लिए मुझे लगा, मानो नन्ही रूपमती लौट आई हो, रूमाल लेकर।

“अच्छा, मैं चलती हूँ। कल फिर आऊंगी। अभी तो आप हैं ना? और हाँ, रंगीली उदास और शहजादा रोता हुआ अच्छा नहीं लगता…”
कहकर वह चली गई।

मैंने पहली बार महसूस किया कि शहजादे के साथ-साथ रंगीली भी फीकी पड़ रही है। बस, तुरंत ही दोनों को नए रूप से सजाने लगा—यह सोचकर कि कल नन्ही रूपमती फिर आएगी, तो कितनी खुश होगी। बहुत दिनों बाद जैसे खुशी की एक ऊर्जा मेरे भीतर समा रही थी।

दूसरे दिन भी प्रोग्राम के बाद वह मेरे पास आकर बैठ गई और कहने लगी—आज शहजादा बहुत खुश और सुंदर दिख रहा है!

“अरे, तुमने रंगीली को नहीं देखा?”

“देखा…”

“वह भी तो कितनी सुंदर दिख रही है…”

“हां! एक बात पूछूँ आपसे?”

“हां, पूछो…”

“आप इन्हें अपनी उंगलियों पर नचाते हो ना…?”

कुछ देर मैं खामोश रहा। वह फिर कहने लगी—

“कभी इनसे पूछा कि इनकी क्या मर्जी है? यह भी तो अपनी मर्जी से नाचना चाहती होंगी कभी…”
कहकर वह खामोश हो गई।

मेरे पास इस बात का कोई जवाब नहीं था। पर मैं सोचने लगा—हम सब भी तो कठपुतली ही हैं। परमात्मा अपने हिसाब से हमारे प्रारब्ध तय करता है, वरना आज रूपमती मेरे साथ होती।

पर यह नन्ही रूपमती भी तो परमात्मा की कृपा के रूप में ही मुझसे जुड़ी है। एक अलग ही स्नेह-भाव की डोर से हम बंध रहे थे।

फिर तीन-चार दिन तक वह नहीं आई। मैं कुछ चिंतित, परेशान हो गया, पर संपर्क सूत्र कोई नहीं। बस इंतजार ही मेरे हिस्से में था, जो मैं कर रहा था।

तभी अचानक वही आहट। देखा तो वह चली आ रही थी। बेसाख्ता मेरे मुंह से निकल पड़ा—”रूपमती, तुम कहां थी इतने दिन?”

उसने चौंककर मुझे देखा, फिर धीरे से बैग में से दो कठपुतलियाँ निकालकर मेरे सामने रख दीं—रंगीली और शहजादे की। दोनों इतने सुंदर सजे थे कि मैं देखता ही रह गया।

नन्ही ने कहा—”क्यों, कैसी सजी हैं ये?”

“बहुत-बहुत-बहुत अच्छी…”

“तुमसे भी अच्छी ना?”

“हां…”

“रूपमती से भी अच्छी… है ना?”

“हाँ…”

“यह दोनों आपके लिए हैं। पर एक प्रॉमिस करना होगा आपको…”

“क्या…?”

“आप उनके हाथों में धागे नहीं बांधेंगे…”

मेरी आँखों से आँसू बहने लगे। मैंने धीरे से अपने आप से कहा—”और एक रूपमती मेरे दिल में जो कैद है, उसे भी आज मुक्त करता हूँ…”

वह कितना समझी, यह तो मैं नहीं समझा, पर उसकी आँखें खुशी से चमक रही थीं। मैंने कठपुतली नचानी छोड़ दी, पर उसने मेरे पास आना नहीं छोड़ा।

साल बीते, वह पढ़ने के लिए बाहर चली गई। जाते-जाते एक ही बात कही—”मैं लौटूं, तब आप मिलोगे ना?”

शब्द सीधे, सरल थे—दिल में उतर गए एक हूक के साथ। पर मैं फिर से निरुत्तर। आँखों की नमी एक-दूसरे से बहुत कुछ कह गई।

तभी मैंने शहजादा उसे थमा दिया, यह कहते हुए—”इसे साथ ले जाओ, यह तुम्हारा ख्याल रखेगा। रंगीली मेरे पास हमेशा है…”

कहकर मैं चला आया, कहीं दूर—उसकी बातों को रंगीली में महसूस करते हुए कि तू कठपुतली नहीं, खूबसूरत सूरत, एहसास है मेरा…

एहसासों के ये धागे…
क्यों हैं मेरे पीछे-आगे…
जहाँ-जहाँ मैं जाऊं, ये भी पीछे भागे…
इन्हें तोड़ दो, छोड़ दो… तो मेरी भी किस्मत जागे…

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