इन्तजार

“खिड़की के पास बैठी एक युवती, हाथ में खत लिए किसी का इंतजार करती हुई”

अर्पणा सिंह “अर्पी

तुम्हारे इन्तजार में हर रात
मैं सपनों को सजोती हूँ,
अपने मन में बनाए भावों को
अक्षरों की माला में पिरोती हूँ,
फिर उन भावों को कागज़ पर उकेरती हूँ।

तुम्हारे इन्तजार में हर रात
मैं सपनों को सजोती हूँ।

यादों के हर तार को जोड़
शब्दों को बुनती हूँ,
शब्दों के उन जालों में
तुम्हारी छवि निहारती हूँ।

तेरी मतवाली आँखों में
खुद को पाती हूँ।

दिन हो या रात हो,
सावन हो या भादों हो,
हर पल तेरे इन्तजार में
खुद को पाती हूँ।

जैसे पतझड़ के बाद
पेड़ पत्तों का इंतजार करता है,
जैसे चाँद अमावस्या के बीत जाने का करता है,
जैसे सीपी बारिश की बूंदों का करती है,
जैसे माली कली के खिल जाने का करता है,
जैसे एक कवि अपनी कविता का करता है—
वैसे मैं तेरे लौट आने का करती हूँ।

उस इन्तजार के अंधियारे-उजियारे में
खुद को भाव-शून्य पाती हूँ,
अपने में ही खोई,
खुद से प्रश्न, खुद ही से उत्तर देती हूँ।

इन्तजार की उत्सुकता और अकुलाहट में
बस तुमको ही खोजा करती हूँ।

पढ़कर चंद ख़त तुम्हारे,
खुद को बहलाया करती हूँ।

हर कदमों की आहट पर
तुम्हारी उपस्थिति को महसूस करती हूँ,
हर हवा के झोंके से
तुम्हारी खुशबू पाती हूँ।

उठ रहे दिल में दर्द को थाम,
हर रात दुल्हन-सा श्रृंगार कर
बस तुम्हारा इन्तजार करती हूँ….

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