
नीरजा कृष्णा, पटना
सिंह साहब और उनकी धर्मपत्नी मेनका जी अपनी पुत्री की तलाक की इच्छा जानकर मर्माहत हो गए। फोन पर उसे बहुत ऊँच-नीच समझाया, पर विनी के रिकॉर्ड की सुई एक ही जगह पर अटकी रही—
“नो मम्मी, मैं उस विश्वासघाती आदमी के साथ अब कोई समझौता नहीं कर सकती…।”
इस बार सिंह साहब चिल्ला पड़े—
“एक ही बात को रटे जा रही हो। उसने आखिर ऐसा क्या विश्वासघात किया है… थोड़ा ऊपर-नीचे तो होता ही रहता है। अपना घर बचाने के लिए औरत को ही समझदारी से काम लेना पड़ता है। हमारी विनी तो बहुत समझदार है भई।”
“पापा, नीला आंटी तो कितनी सौम्य, शांत और आपके अनुसार समझदार भी थीं। उन्हें अपनी समझदारी का क्या उपहार मिला… मम्मी ने तो आकर उनके उस पवित्र मंदिर को ही तहस-नहस कर दिया। है न?”
सिंह साहब के हाथ से मोबाइल ही गिर गया। बगल में बैठी मेनका अपनी ही बेटी के मुख से अपने खिलाफ इतनी बड़ी बात सुनकर हक्की-बक्की रह गई थीं। बहुत हिम्मत करके फोन उठाया और बोल पड़ीं-
“वो सब बातें छोड़ो। तुम जानबूझकर अपनी गृहस्थी में आग लगा रही हो। अपने निर्णय पर एक बार फिर शांत मन से विचार करो। वैसे हम दोनों कल ही तुम्हारे पास आ रहे हैं।”
इस बार विनी चिड़चिड़ा गई और बहुत रूखे स्वर में आर्तनाद करने लगी
“आप दोनों कान खोलकर सुन लीजिए। मैंने अर्जुन से तलाक लेने का निर्णय कोई जानबूझकर नहीं, बल्कि बहुत सोच-समझकर लिया है।”
“बेटा, हम फिर कहते हैं… इतनी नादानी मत करो। अपना बसा-बसाया घर मत तोड़ो।”
विनी व्यंग्यात्मक लहजे में कराह उठी.
“मम्मी, मैं बहुत नादान हूँ। आपकी तरह स्मार्ट और होशियार नहीं हूँ। मुझे संतोष है कि मैं अपना ही घर तोड़ रही हूँ। अपनी मम्मी की तरह किसी दूसरे का घर तो नहीं तोड़ रही।”

अतिशय आभार सर
वाह बहुत सुन्दर पारिवारिक जीवन पर आधारित एक शिक्षाप्रद लघुकथा 👌👍👏👏👏👏