
रुचि अग्रवाल, सिलीगुड़ी, पश्चिम बंगाल
हमने इतने घाव सिए हैं,
ना तुम कभी गिन पाओगे
इतने टुकड़ों में बिखर गए थे,
ना जिन्हें कभी बिन पाओगे
सिसका था दर्द में पोरा-पोरा,
ज़र्रा-ज़र्रा करहाया था
खून के आँसू बह निकले थे,
जब ऐसा आलम आया था
जख्मी की जा रही थी आत्मा,
लेश मात्र करुणा न थी
मेरी इस निर्मम हालत की
जिम्मेदार… मेरी भावनाएँ थीं
बिन सोचे, बिन समझे सब पर
करुणा करना था अपराध
निरर्थक इस आदत के कारण
मैं होती रही हर क्षण बर्बाद
कितनों ने दिल तोड़ा मेरा,
मेरे… जज़्बातों से खेल गए
अनंत दर्द देकर मेरे मन को
दुख के सागर में ठेल गए
ऐसा मेरे ही ,साथ क्यों होता,
आता था मन में ख्याल
ज़िंदगी सबक सिखा रही थी,
फेंककर अपना माया-जाल
जब तक सबक ,ना हुआ यह पूरा,
निरंतर मुझे आज़माया गया
जीवन के इम्तहान में ना
होती करुणा, ना कोई दया
ऐसा रट्टा मैंने मार लिया अब,
सबक कभी न भूलूँगी
अपने जज़्बातों की चादर
अब जीवन भर नहीं खोलूँगी
नहीं मिलेगा कोई आसरा
मेरे… अपनत्व के छत तले
नहीं पिघलेगा यह मन अब मेरा,
किसी को… सिसकते हुए देखूँ भले।

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