मैं इक किताब…
हम सबके भीतर एक कोरा पन्ना होता है, जिस पर समय और अनुभव धीरे-धीरे अपने रंग भरते हैं। इन्हीं रंगों से जीवन की कहानी बनती है. कभी खुशी, कभी अधूरी इच्छाओं के साथ। अंततः यही भावनाएँ हमें एक ऐसी किताब में बदल देती हैं, जिसे हम जीते भी हैं और समझते भी हैं।
