
डॉ. रुपाली गर्ग, मुंबई
कृष्णा! तेरे रूप हैं अनुपम, अपार,
हर युग में करते तू जग का उद्धार।
कभी बाल रूप में माखन चुराते,
माँ यशोदा से नटखट कहलाते।
कभी ग्वालों संग बंसी बजाते,
मुरली की धुन पर सबको रिझाते।
कभी कालिया नाग मर्दन कर जाते,
कभी गोवर्धन पर्वत उठा दिखाते।
कभी रुक्मिणी संग प्रेम रचाते,
कभी सुदामा संग दाना बाँट खाते।
कभी रणभूमि में सारथी बन जाते,
धर्म और कर्म का ज्ञान सिखाते।
कभी द्रौपदी का मान बढ़ाते,
दुर्व्यवहार पर न्याय दिलाते।
कभी भक्तों के मनमोहन कहलाते,
कभी मीरा के प्राण बस जाते।
कभी नरसी के गीतों में झूमते,
कभी सूरदास की भावनाओं में घुलते।
लीला तेरी है गहन और अनंत,
तू ही है शाश्वत, तू ही है चिरंतन।

बहुत ही सुंदर भाव..
भक्ति की खूबसूरत अभिव्यक्ति 💕🙏