
अर्पणा सिंह ‘अर्पी’ रांची
खलिहान से नई फसल के घर आने की खुशियाँ मनाएँ,
आओ मिल-जुलकर हम सब सतुआनी पर्व मनाएँ।
बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, नेपाल के जन-जन,
मेष संक्रांति पर मनाएँ यह पावन पारंपरिक उत्सव धन।
शीतल पदार्थ अर्पित कर पूर्वजों को श्रद्धा से याद करें,
मिलकर सब इस पर्व को हर्षोल्लास से आबाद करें।
बाबूजी कहते सत्तू के होते चार यार,
चोखा, चटनी, सलाद और संग में स्वादिष्ट अचार।
जो दे तन को शीतलता, गर्मी से हमें बचाए,
आओ थोड़ा सत्तू खाएँ, स्वास्थ्य भी संग में लाएँ।
बचपन की सुनहरी यादों को फिर से ताजा किया जाए,
खत्म हुआ अब खरमास, शुभ कार्यों को सजाया जाए।
घड़े में भर शीतल जल, गुड़, आम, दही और सत्तू,
ज़रूरतमंदों के घर जाकर बाँटें प्रेम का यह जतन सच्चू।
छाता लेकर, सेवा भाव से, मानवता को निभाया जाए,
सतुआनी के इस पर्व को मिलकर और सजाया जाए।
यह केवल त्योहार नहीं—प्रकृति, स्वास्थ्य और संस्कृति का संगम है,
नवयुग की पीढ़ियों से जोड़ें इसे, यही हमारा धर्म है।
आओ मिलकर नई फसल के आने की खुशियाँ मनाएँ,
सतुआनी पर्व को प्रेम और उल्लास से सजाएँ।

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