चीखती इंसानियत

अंधेरी गली में भूखा बच्चा, पृष्ठभूमि में झगड़ा और सामने जलता हुआ दीया, जो उम्मीद का प्रतीक है.

डॉ.रुपाली गर्ग, मुंबई

चीख रही है इंसानियत, हर गली, हर मोड़ पर,

अपने ही हाथों लहूलुहान,खड़ी है दर्द के घोर पर।

कहीं भूख से तड़पते बच्चे, कहीं रिश्ते हुए लाचार,

कहीं नफरत की आंधी में, उड़ते सपनों के घर-द्वार।

क्यों इतना अंधा हो गया है,मन का उजियारा खोकर,

इंसान ही इंसान को कुचलता,अपने स्वार्थों में डूबकर।

कहाँ गया वो प्रेम पुराना,अपनापन, विश्वास,

आज हर दिल में उठता केवल, शक, भय और त्रास।

पर अभी भी एक किरण बाकी,अंधियारे के पार कहीं,

अगर जागे संवेदना फिर,तो बदलेगा संसार यहीं।

उठो, जलाओ दीप करुणा का, मन में प्रेम जगाओ,

इस चीत्कार करती दुनिया में, फिर से इंसान बन जाओ॥

डॉ. रुपाली गर्ग
एक शिक्षिका, लेखिका और साहित्य साधिका हैं, जिन्होंने बरेली विश्वविद्यालय से पीएचडी तथा चेन्नई से MBA किया है।वे पिछले 2 वर्षों से लेखन में सक्रिय हैं और अब तक 300 से अधिक रचनाओं का सृजन कर चुकी हैं।
उनकी लेखनी में स्त्री, जीवन, वियोग और अनुभवों की गहराई झलकती है, साथ ही उन्हें जासूसी और दर्शनशास्त्र आधारित साहित्य पढ़ना विशेष रूप से पसंद है।
उनकी रचनाएँ 500+ साझा संकलनों व पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं, तथा वे कई साहित्यिक सम्मेलनों की गरिमा बढ़ा चुकी हैं. साथ ही उनकी 2 पुस्तकें प्रकाशित हैं और वे विभिन्न साहित्यिक मंचों पर उपाध्यक्ष एवं सह-संस्थापिका के रूप में सक्रिय हैं।

7 thoughts on “चीखती इंसानियत

    1. भूख , नफरत, स्वार्थ का हर ओर दृश्य
      इन्सानियत की चीख़-पुकार का बोलबाला । लेखिका का आव्हान है हम सब सिर्फ प्रेम से बदल सकते हैं इस वातावरण को । आपस मे मेलजोल और स्नेह ही हमारे समाज को बदल सकता है ।

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