
वर्षा गर्ग, प्रसिद्ध लेखिका, मुंबई
सही राह!
“बिट्टू! कहाँ हो बेटा, देखो तुम्हारे लिए क्या लाया हूँ।”
लू के थपेड़ों को झेलते, साइकिल चलाते हुए, दो शिफ्ट में काम कर फैक्टरी से लौटे दीपक की आँखें बिट्टू को ढूँढ रही थीं।
“आ गए आप?” पानी का गिलास थमाते हुए पत्नी ने आँखें झपकाकर, गाल फुलाकर बिट्टू के टांड़ पर छुपे होने का इशारा किया। फिर सामान्य स्वर में बोली, “यहीं तो था अभी, पता नहीं कहाँ गायब हो गया।”
मतलब, अभी तक गुस्सा उतरा नहीं है. यह सोचते हुए दीपक बिट्टू को ढूँढने का नाटक करने लगा।
“मिल गया! पकड़ लिया मैंने।”
“छोड़ो मुझे! पहले बताओ, जूते लाए क्या? नहीं तो मैं आपसे बात नहीं करूँगा।”
“देखो, जूतों से भी बढ़िया कितनी अच्छी चीज़ लाया हूँ।”
अब बिट्टू भी उत्साहित होकर पापा के हाथ से पैकेट छीनकर खोलने लगा। ढेरों रंग-बिरंगी, चिकने कवर वाली किताबें फर्श पर बिखर गईं।
“क्या है ये? मुझे तो लाइट वाले जूते ही चाहिए! पिछली बार भी वादा किया था, मगर आज तक गियर वाली साइकिल नहीं दिलवाई। पापा, मैं आपसे कुट्टी हूँ।”
“बिट्टू बेटा! मेरी बात सुनो, फिर चाहे जो करना।”
“क्या है पापा?” बिट्टू की आवाज़ में साफ़ नाराज़गी झलक रही थी।
“देखो बेटा! तुम्हारे लाइट वाले जूते हों या गियर वाली साइकिल हर चीज़ का रास्ता ये किताबें तुम्हें दिखाएँगी।
तुम बस पढ़ो… इतना पढ़ो कि दुनिया की कोई बात तुम्हारे लिए अजूबा न रहे।”
बिट्टू ने धीरे से एक किताब खोली—
“अरे वाह! ये अंतरिक्ष कितना सुंदर है… ये रही पृथ्वी… और ये सूर्य!
पापा, देखो सैटर्न के चारों तरफ कितनी प्यारी रिंग है… देखो ना!”
दीपक मंत्रमुग्ध-सा अपने छोटे से बेटे को निहार रहा था।
ईश्वर का धन्यवाद करते हुए
आखिर उसके बेटे को सही राह मिल ही गई!
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