
सपना चंद्रा, प्रसिद्ध कवयित्री, कहलगांव, भागलपुर
गुल-पोश हैं बाग-बगीचे,
चहुँ ओर सब सजे-धजे।
हवाएँ आकर सहला जातीं,
मौसम से जैसे गले मिले।
गर्म लिहाफ-सी धूप गुनगुनी,
मिज़ाज में ज्यों घुली-मिली।
अलकें कर रही सरगोशियाँ,
हँसी चेहरे सब खिले-खिले।
यादें संग चल रही हैं मगर,
कहीं ख़याल कुछ गुम-से मिले।
किस्मत सब कुछ छीन लेती,
खुशियाँ लगतीं तब बुलबुले।
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