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पिंक फ्रॉक

प्रिया राय त्रिपुरा, अगरतला

आज पिंकी सुबह से ही उदास थी। उसे नई पिंक फ्रॉक चाहिए थी, जैसी उसकी सहेली ने अपने जन्मदिन पर पहनी थी। वह सुबह से रो रही थी और ज़िद कर रही थी –“माँ, मुझे अभी पिंक फ्रॉक चाहिए!”

माँ ने प्यार से समझाया –“बेटा, शाम को ले आएँगे। अभी तो बहुत काम बाकी है। तुम्हारे लिए रसगुल्ला, पूरी और हलवा बनाना है।” पर पिंकी कुछ भी सुनने को तैयार नहीं थी।

तभी दरवाज़े की घंटी बजी। पड़ोसन रीता अपनी बेटी मुन्नी को लेकर आई। मुन्नी के कपड़े बहुत पुराने और फटे हुए थे। उसे देखकर पिंकी चुप हो गई।वह तुरंत अंदर भागी और अलमारी से अपनी दो सुंदर फ्रॉक निकालकर ले आई। उसने मुस्कुराते हुए कहा –“मुन्नी, यह तुम पहन लो।”

जैसे ही मुन्नी ने फ्रॉक पहनी, वह सचमुच राजकुमारी लगने लगी। पिंकी की आँखें खुशी से चमक उठीं। उसने मुन्नी का हाथ पकड़ा और बोली –“माँ, अब मुझे पिंक फ्रॉक नहीं चाहिए। मैं तो अपनी दोस्त के साथ खेलने जा रही हूँ।”

और दोनों हँसते-खिलखिलाते बाहर निकल गए।

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