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“अगर ‘ना’ कह देती तो मैं गुलज़ार होता”

अनुपम नीता बर्डे, बिलासपुर

दुनिया कहती है कि हर एक सफल पुरुष के पीछे एक स्त्री होती है!
लेकिन भैया लोग, मैं तो स्पष्टवादी हूँ, कहीं-न-कहीं से हरीशचंद्र जी की फैमिली से जुड़ा हूँ, इसलिए साफ-साफ कहता हूँ कि मेरी असफलता के पीछे मेरी बीवी का ही हाथ है!अब देखिए न, यदाकदा मेरे फेसबुक मित्र मिलते रहते हैं—कभी बाज़ार में, कभी मॉल में, कभी रास्तों पर तो कभी गार्डन में। अक्सर लोग यही कहते हैं—”अनुपम जी, आप अच्छा लिखते हैं, मज़ा आ जाता है, आप अपने लेखों को संकलित करके छपवाइए न।”
जब भी ऐसा सुनता हूँ, मेरा अंतर्मन रोने लगता है। कहता है—”रे मूर्ख आदमी, तू बुढ़ऊ कैटेगरी में आकर लिखना आरंभ किया है। जब तेरी लाइफ़ के अकाउंट में गिने-चुने साल शेष हैं, तू अपनी जवानी में लिखना आरंभ करता तो आज बढ़िया लेखकों की श्रेणी में आ जाता, खूब नाम कमाता।”
मैं चुपचाप शांत बैठ जाता हूँ। जब विचार करता हूँ कि मैंने अपनी जवानी में ही लिखना आरंभ क्यों नहीं किया, तो पूर्ण रूप से अपनी बीवी नीता को ही दोषी पाता हूँ।

दरअसल, लिखने के लिए उचित वातावरण और खुद के अंदर रसों की—जैसे श्रृंगार रस, रौद्र रस, करुण रस, हास्य रस आदि—आवश्यकता होती है। मेरे अंदर ये सभी रस मौजूद हैं, लेकिन इन रसों को मैं निकाल नहीं पाया! निकालता भी कैसे? अरे, रस निकालने के लिए उचित वातावरण की आवश्यकता होती है, जो नीता ने बनने ही नहीं दिया!

एक बेचारे लड़के को एक प्रेमिका स्थापित करने के लिए कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं! एक-से-एक प्रेम भरी कविताएँ, शायरियाँ, ग़ज़ल, गीत और डायलॉग लिखने पड़ते हैं, जिससे उसमें लेखन की शैली विकसित होती है। माफ करना दोस्तों, ये मैं आज के प्रेमी युगलों के लिए नहीं लिख रहा हूँ, क्योंकि आज के जवान तो बस कॉपी-पेस्ट का काम करते हैं। मैं उन्हें दोष भी नहीं दे रहा हूँ, क्योंकि आज के युवा हमारे जैसे बैठे-ठाले थोड़े ही हैं जो केवल एक के पीछे ही अपना पूरा समय लगा दें; ये बेचारे “मल्टी-टास्किंग सिस्टम” पर चलते हैं—यानि हर मोहल्ले में एक-एक। तो इतने कॉम्प्लिकेटेड सिस्टम को मैनेज करने के लिए इन्हें “कॉपी-पेस्ट” का सहारा लेना पड़ता है। मैं इनकी योग्यता की दाद देता हूँ!

हाँ, तो मैं अपनी बात कर रहा था। जब मैंने पहली बार नीता से पूछा—”शादी करोगी?”—तो खटाक से उत्तर दे दिया—”हाँ।”
मैं सोचता हूँ कि यदि वह “ना” कह देती या ना-नुकुर करती, तो मेरे अंदर के कई रस जैसे “दिल-टूट रस”, “बेचारा रस”, “मजनूं रस” आदि-आदि उमड़ने लगते और मैं अपने रसों को शायरियों, कविताओं, लेखों में उंडेलते जाता, लिखते जाता, और आज प्रसिद्ध लेखकों की कतार में होता!
काश, उस दिन वह मुझे “नहीं” कह देती, तो शायद प्रसिद्ध गीत—”जब दिल ही टूट गया, हम जी के क्या करेंगे”—का गीतकार मैं ही होता!

आप लोग भी इस बात से सहमत होंगे कि प्रेम-पत्र लिखना भी एक कला होती है। इस कला में झूठ को कितने शानदार तरीके से सच में ढाला जाता है, असंभव को संभव बनाया जाता है। इसे लिखने में भाषा-शैली और लेखन-कला का कितना बढ़िया विकास होता है, लेकिन मुझ बेचारे को हर शाम अपने घर बुलाकर, कॉफी पिलाकर, नीता ने प्रेमपत्र लिखने का कोई मौका ही नहीं दिया और लेखन-योग्यता से वंचित कर दिया!

अब आप कह सकते हैं कि चलिए, जब आप बेरोकटोक प्यार में सफल हो गए, तो कम से कम श्रृंगार रस वाले लेख लिखते—”चंदन सा बदन, चंचल चितवन” जैसा कुछ।
मैं यही कहना चाहूँगा, मित्रों, कि इस प्रकार के लेख मैं लिखने लगूँ न, तो मेरे फेसबुक के युवा मित्र यही कहेंगे—”अरे, क्या चंदन और चंचल कर रहे हो, चाचाजी? हम तो ‘चोली, जाड़ा और खटिया’ जैसी रचनाओं को भी पंद्रह साल पहले ही निबटा चुके हैं।”

इसलिए अब चुप हूँ, खामोश हूँ।
क्या लिखूँ?

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