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सावन सोमवार पर हास्य व्यंग्य लेख, शिव भक्ति और जीवन का संदेश

सावन सोमवार और रिश्तों की तलाश

सावन सोमवार आते ही व्रत, पूजा और मनचाहे वर की कामनाओं का दौर शुरू हो जाता है। लेकिन क्या सिर्फ उपवास से जिंदगी की खुशियां मिल जाती हैं? एक हल्के-फुल्के अंदाज में यह व्यंग्य बताता है कि खुद को बेहतर बनाना, अच्छे कर्म करना और जीवन का आनंद लेना भी उतना ही जरूरी है।
सावन का मजा लीजिए, भक्ति को सच्चे मन से निभाइए और खुद को इतना काबिल बनाइए कि खुशियां खुद आपके दरवाजे तक आएं।

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“अगर ‘ना’ कह देती तो मैं गुलज़ार होता”

दुनिया कहती है कि हर एक सफल पुरुष के पीछे एक स्त्री होती है!
लेकिन भैया लोग, मैं तो स्पष्टवादी हूँ, कहीं-न-कहीं से हरीशचंद्र जी की फैमिली से जुड़ा हूँ, इसलिए साफ-साफ कहता हूँ कि मेरी असफलता के पीछे मेरी बीवी का ही हाथ है!अब देखिए न, यदाकदा मेरे फेसबुक मित्र मिलते रहते हैं—कभी बाज़ार में, कभी मॉल में, कभी रास्तों पर तो कभी गार्डन में। अक्सर लोग यही कहते हैं—”अनुपम जी, आप अच्छा लिखते हैं, मज़ा आ जाता है, आप अपने लेखों को संकलित करके छपवाइए न।”

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आंख मारने की कला

अनुपम नीता बरडे, प्रसिद्ध व्यंग्यकार, बिलासपुर (छत्तीसगढ़) मैं उस शख़्स को शाष्टांग दण्डवत करता हूँ जिसने पहले पहल “आँख मारने ” की कला विकसित की ! ज़रा आप ही सोच कर देखिये कि इस छोटे से , सरल से “संकेत” से कितना बड़ा “संदेश” , पलक झपकते ही दूसरी ओर चला जाता है और मैं…

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