Live Wire News literary portal with Gulmohar and Rajnigandha flowers

अस्तित्व…

अस्तित्व की खोज में वह खुद से बार-बार टकराती है। कभी सपनों में, कभी आकांक्षाओं में, तो कभी शब्दों की परछाइयों में अपने होने का अर्थ तलाशती है। वह अपने भीतर दबे सवालों को सुनती है—”कौन हूँ और क्या हूँ मैं?” और हर बार यह अहसास होता है कि उसका वजूद अभी अधूरा है। यही अधूरापन उसे फिर से जगाता है, नव-कोंपलों-सा उगाता है। अंततः वह अपने भीतर एक ऐसा वृक्ष देखती है, जो अपनी जड़ों से अनगिनत संभावनाएँ पोषित करता है। यही उसका नया अस्तित्व है—सशक्त, गहन और अडिग।

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इंतजार में अमृता प्रीतम…

यह रचना अमृता प्रीतम, साहिर और इमरोज़ की अमर प्रेमकथा की संवेदनाओं को छूती है। लेखिका के अंतर्मन में यह प्रश्न उठता है कि क्या स्वयं वह अमृता जैसी हो सकती है, जिसे साहिर का अल्हड़ किन्तु अनकहा प्रेम मिला और इमरोज़ का निःस्वार्थ साथ। प्रेम की यह त्रयी—अनकहे भाव, निस्वार्थ समर्पण और अनंत प्रतीक्षा—मानव हृदय के उस गूढ़ कोने को उजागर करती है जहाँ प्रेम अपनी सीमाओं और परिभाषाओं से परे जाकर केवल “होने” में अर्थ पाता है। यही सोच अमृता को कालजयी बनाती है और यही प्रश्न आधुनिक मन को बेचैन करता है—क्या अब भी ऐसा दुर्लभ प्रेम संभव है?

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ख़त अपने नाम…

आज का खयाल सीधा दिल को छू गया—क्यों न खुद से ही अपनी कीमत पूछी जाए, बजाय दूसरों की नज़रों में ढूँढ़ने के। क्यों न एक ख़त खुद को लिखा जाए, जिसमें अपने ही बचपन की हँसी, अपनी ही रंगीन तितली-सी चंचलता, और अपनी ही खुशबू को फिर से महसूस किया जाए। जीवन की भाग-दौड़ में खोकर हम खुद को सँवारना भूल जाते हैं, लेकिन जब खुद से मुलाक़ात होती है, तो एहसास होता है कि सबसे बड़ा ख़िताब, सबसे सुंदर परिभाषा, हमेशा से हमारे अपने ही नाम थी।

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भंँवरे ने खिलाया फूल, फूल को ले गया राज कुंँवर….

मेरे जीवन की वाड़ी, जिसे मैंने प्रेम और समर्पण से सींचा, फूलों-सी महकी और पत्तों-सी निखरी। भौंरे उसकी मिठास में आकर्षित होकर अपने हिस्से का रस ले गए। मैंने जिन लोगों को अपना मानकर आगे बढ़ने का हिस्सा बनाया, उनका साथ भी किसी उद्देश्य से था—पर वे सगे नहीं थे, और समय ने उनके असली चेहरे दिखा दिए। उनकी ज़रूरतें और इच्छाएँ अधिक थीं, और जब तक मैं काम आता, वही काफी था। फिर भी, हौसलों को बुलंद रखकर, नेक काम करके, आगे बढ़ जाना ही सही राह है।

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