सूर्योदय के समय चट्टान पर आत्मविश्वास से खड़ी भारतीय महिला, चेहरे पर दृढ़ता और शक्ति का भाव।

कुछ भी कहो…

“कुछ भी कहो” एक प्रेरक कविता है जो स्त्री की शक्ति, सहनशीलता, संघर्ष और आत्मविश्वास को उजागर करती है। यह कविता बताती है कि नारी केवल नाम नहीं, बल्कि सृजन और शक्ति का स्वरूप है।

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खिड़की के पास खड़ी सांवली भारतीय महिला, चेहरे पर शांति और प्रेम की अनुभूति, कंधों पर पड़ती हल्की धूप।

देह पर ठहरा मौसम !!

“देह पर ठहरा मौसम!!” एक ऐसी संवेदनशील कविता है जिसमें प्रेम के प्रथम स्पर्श, स्मृतियों की गर्माहट और आत्मा तक उतरती अनुभूतियों को बेहद कलात्मक ढंग से व्यक्त किया गया है।

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एक आत्मविश्वासी युवती सूर्योदय के समय छत पर खड़ी है, उसके पास टूटा हुआ पिंजरा पड़ा है और आसमान में उड़ते पक्षी आज़ादी और सपनों की उड़ान का प्रतीक हैं।

उड़ान

‘उड़ान’ एक प्रेरणादायक हिंदी कविता है, जो लड़कियों के आत्मसम्मान, स्वतंत्र सोच और सपनों को पंख देने की बात करती है। यह कविता समाज की बंदिशों के विरुद्ध हौसले और विश्वास का संदेश देती है।

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पेड़ की छांव में बैठी महिला स्कूल परिसर में लिख रही है, आसपास खेलते बच्चे और तितलियां हैं, जबकि पृष्ठभूमि में युद्धग्रस्त शहर की धुंधली छवि दिखाई दे रही है।

सत्य

‘सत्य’ एक गहन और विचारोत्तेजक कविता है, जो अमन के बीच युद्ध की भयावहता, बच्चों की मासूमियत और मानव सभ्यता के क्रूर यथार्थ को सामने लाती है। यह कविता शांति, संवेदना और सत्य की खोज का मार्मिक दस्तावेज है।

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रात के समय महल से जाते बुद्ध, पीछे यशोधरा गोद में राहुल को लिए दुख और धैर्य के साथ खड़ी हैं।

पुनर्जन्म

‘पुनर्जन्म’ एक विचारोत्तेजक कविता है जो बुद्ध के संन्यास और यशोधरा के मौन त्याग के बीच स्त्री जीवन के अनकहे संघर्ष को उजागर करती है। यह कविता समाज की दोहरी मानसिकता पर गहरा प्रश्न उठाती है।

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कड़ी धूप में काम करती एक भारतीय मजदूर महिला, चेहरे पर थकान और उम्मीद, पीछे पढ़ते बच्चे, दो वक्त की रोटी के संघर्ष का भावुक दृश्य।

रोटी दो जून की

अर्पणा सिंह “अर्पी” , रांची बड़ी मुश्किलों से मिल पाती है निजात,मज़दूरों को पाने में रोटी दो जून की सौगात। बैशाख की दोपहरी की धूप या बहती लू,पसीने से लथपथ हो या हो तपती भू।तन ढकने को वसन और मिटाने को भूख,इसी की आपूर्ति में रहते हैं हर पल मशगूल। बड़ी मुश्किलों से मिल पाती…

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सूर्योदय के समय निर्माण स्थल पर खड़ा एक भारतीय श्रमिक, चेहरे पर थकान और गर्व के भाव, मेहनत और संघर्ष का प्रेरक दृश्य।

हाँ, मैं श्रमिक हूँ

“हाँ मैं श्रमिक हूँ” एक प्रेरक और संवेदनशील हिंदी कविता है, जो मजदूर वर्ग के संघर्ष, परिश्रम और त्याग को उजागर करती है। कविता बताती है कि श्रमिक अपने परिवार से दूर रहकर कठिन मेहनत करता है, लेकिन फिर भी अपने काम में गर्व महसूस करता है। छुट्टियाँ, आराम और उत्सव उसके जीवन में कम होते हैं, फिर भी वह समाज की रफ्तार चलाता है। यह कविता मेहनतकश लोगों के जीवन की सच्चाई को सरल शब्दों में सामने लाती है और श्रमिकों के प्रति सम्मान जगाती है।

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भारत में रोटी के लिए लाइन में खड़े अमीर और गरीब लोग, भूख और जीवन संघर्ष को दर्शाता भावुक यथार्थवादी दृश्य।

सब लोग तेरे दीवाने

“सब लोग तेरे दीवाने” एक संवेदनशील हिंदी कविता है, जो रोटी के महत्व और भूख की पीड़ा को गहराई से व्यक्त करती है। यह कविता बताती है कि अमीर हो या गरीब, हर इंसान की पहली जरूरत रोटी ही है। जीवन के संघर्ष, इच्छाओं और हालातों के बीच रोटी की तलाश कभी खत्म नहीं होती। कवि ने सरल शब्दों में समाज की वास्तविकता, गरीबी और मानवीय जरूरतों को बेहद प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया है। यह कविता पाठकों को सोचने पर मजबूर करती है कि रोटी केवल भोजन नहीं, बल्कि जीवन का आधार है।

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पुरानी छत पर सूखते कपड़े, दर्पण और बिखरे फूलों के साथ यादों से भरा भावनात्मक दृश्य

यादें…

यह कविता यादों की उस दुनिया को शब्द देती है, जहाँ प्रेम, बिछड़न और बीते पलों की महक आज भी जीवित है। सूखे फूलों, होली के रंगों और बारिश की स्मृतियों के माध्यम से मन में छिपी भावनाओं को बेहद मार्मिक ढंग से व्यक्त किया गया है।

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