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युद्ध और उसके परिणामों पर चिंतन को दर्शाता एक प्रतीकात्मक दृश्य, जिसमें धुएँ और विनाश के बीच खड़ा एक अकेला व्यक्ति संघर्ष और मानवता पर विचार कर रहा है।

युद्ध की समझ…

युद्ध कोई नहीं चाहता, फिर भी इतिहास गवाह है कि कई बार परिस्थितियाँ और अन्याय ऐसे मोड़ पर ले आते हैं, जहाँ संघर्ष अपरिहार्य हो जाता है। यह कविता युद्ध के पक्ष या विपक्ष में नहीं, बल्कि उसकी समझ विकसित करने का प्रयास है।

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द्ध और प्रदूषण के कारण उठता काला धुआँ, जो आसमान को ढकते हुए विनाश और पर्यावरण संकट का प्रतीक बन गया है।

मैं हूँ धुआँ…

यह कविता धुएँ को एक दैत्याकार शक्ति के रूप में चित्रित करती है, जो युद्ध, बम, मिसाइलों और आग से जन्म लेकर पूरे वातावरण को विषाक्त कर देना चाहती है। यह केवल प्रदूषण की नहीं, बल्कि मानव सभ्यता के आत्मविनाश की कहानी भी है।

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An elderly Indian father caring for his sick wife in a dimly lit room, reflecting loneliness, sacrifice, and the struggles of old age.

पिता की पीड़ा

वर्तमान पिता” एक मार्मिक कविता है, जो उस पिता की कहानी कहती है जिसने अपना पूरा जीवन परिवार के लिए समर्पित कर दिया, लेकिन बुढ़ापे में उपेक्षा, अकेलेपन और स्वार्थपूर्ण रिश्तों का सामना कर रहा है। यह कविता बदलते पारिवारिक मूल्यों और माता-पिता के प्रति संवेदनशील होने का संदेश देती है।

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A diverse group of Indian people, including children, adults, and senior citizens, practicing yoga together in a green park at sunrise, promoting health, wellness, and community spirit.

योग करो, स्वस्थ रहो

योग करो, स्वस्थ रहो” एक प्रेरणादायक कविता है जो योग के महत्व, स्वस्थ जीवन, मानसिक शांति और निरोग भारत के संदेश को सरल एवं प्रभावशाली शब्दों में प्रस्तुत करती है। यह कविता सभी को दैनिक जीवन में योग अपनाने और स्वस्थ समाज के निर्माण का संकल्प लेने के लिए प्रेरित करती है।

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सीता चाहिए, तो राम भी बनो

यह कविता समाज में व्याप्त दहेज प्रथा, एसिड अटैक, महिलाओं के प्रति हिंसा और दोहरे मापदंडों पर तीखा प्रश्न उठाती है। साथ ही यह पुरुषों को राम और कृष्ण जैसे आदर्शों का अनुसरण कर नारी सम्मान की रक्षा करने का संदेश देती है।

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जीवन के सफर में साथ चलते लोगों और रिश्तों को दर्शाती प्रेरणादायक हिंदी कविता।

जीवन के इस मेले में

जीवन एक मेला है, जहाँ कुछ लोग साथ निभाते हैं, कुछ ठोकरें देते हैं और कुछ हमें मजबूत बनाकर आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं। यह कविता जीवन के इन्हीं रंगों और सच्चे रिश्तों का भावपूर्ण चित्रण है।

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उफनते सागर के किनारे खड़ा एक चिंतनशील व्यक्ति अपनी परछाई को निहारता हुआ, समय, अस्तित्व और जीवन के बदलते किरदारों पर मनन करता हुआ।

किरदार

हम सभी अपने भीतर कई किरदारों को जीते हैं। कुछ समय के साथ खो जाते हैं, कुछ स्मृतियों में रह जाते हैं, और कुछ जीवन के संघर्षों के बीच नई पहचान गढ़ते हैं। ‘किरदार’ जीवन, समय, जिजीविषा और आत्म-अस्तित्व की उसी अंतर्द्वंद्वपूर्ण यात्रा का काव्यात्मक दस्तावेज़ है।

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आधी खुली किवाड़ से बाहर झाँकती एक चिंतनशील भारतीय स्त्री, स्वतंत्रता और आत्म-अभिव्यक्ति की आकांक्षा का प्रतीक।

गुम औरतें

आधी खुली किवाड़ों से बाहर झाँकती वे स्त्रियाँ, जिन्होंने सीमाओं के भीतर रहकर भी खुले आकाश का सपना देखा था। समय के साथ वे कहीं गुम-सी हो गईं, लेकिन उनकी इच्छाएँ, मुस्कानें और स्वतंत्रता की आकांक्षा आज भी हमारे भीतर जीवित हैं।

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सीरत और सूरत के अंतर को दर्शाती हिंदी कविता, जिसमें चरित्र, संस्कार और आंतरिक सुंदरता की महत्ता का वर्णन किया गया है।

सीरत और सूरत

बाहरी सुंदरता समय के साथ फीकी पड़ सकती है, लेकिन अच्छे संस्कार, चरित्र और सौम्यता जीवनभर व्यक्ति की पहचान बने रहते हैं। सीरत और सूरत के अंतर को दर्शाती यह कविता पाठकों को आत्ममंथन के लिए प्रेरित करती है।

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