दो सितारों का मिलन…42 साल बाद

बयालीस साल बाद हुई यह मुलाकात सिर्फ दो पुराने साथियों के मिलने भर की नहीं थी, बल्कि उन दिनों की धड़कनों को फिर से जी लेने जैसा अनुभव थी। इंदौर की गलियों में साइकिल से खबरों की तलाश में दौड़ते हुए बिताए गए वे दिन यादों की परतों से झाँकने लगे — अनंत चतुर्दशी की रातें, दंगों के बीच रिपोर्टिंग की बेचैनी, और श्मशानघाटों से जुटाई गई खबरों की जिम्मेदारी।

रतलाम के घर में बैठे हुए, चाय की प्यालियों के बीच समय जैसे ठहर गया था। हम दोनों बीच-बीच में ठहाके लगाते, कभी पुराने नामों को याद करते और कभी आज की पत्रकारिता पर अफसोस जताते। प्रदीप जब अपनी खबरों के डिजिटलाईजेशन की बात कर रहे थे, तो मन में एक अजीब कसक उठी — कुछ चीज़ें वक्त के साथ सँभाल लेनी चाहिए थीं।

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संदूक भर जीवन

घर के पिछले कमरे में रखा वह पुराना संदूक अब एक वस्तु नहीं रहा, वह मानो माँ के जीवन की पूरी कथा समेटे बैठा है। उसमें मायके की यादें हैं, विवाह की रस्मों के निशान हैं, और मातृत्व के पहले क्षणों की सोंधी गंध अब भी बसी है। हर वस्तु, हर दस्तावेज़ किसी बीते समय की गवाही देता है — मनीऑर्डर का पन्ना, साइकिल की रसीद, गाँव का ढहता इतिहास।
माँ के झुर्रियों वाले हाथ जब उसे छूते हैं, तो उनमें फिर वही स्फूर्ति लौट आती है, जैसे वर्षों पीछे लौट गई हों। और मैं, उस संदूक को निहारते हुए, महसूस करती हूँ कि उसमें सिर्फ़ माँ का ही नहीं, मेरा भी जीवन धीरे-धीरे सिमट आया है — तस्वीरों, कपड़ों और दस्तावेज़ों के रूप में। यही तो है “संदूक भर जीवन।”

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आसरा

पने भीतर के अदृष्ट संसार और भावनाओं की गहराई को व्यक्त करती हैं। यह कविता यादों, अनुभवों और उन कहानियों की प्रतीक है जो हमारे मन में ठहरी रहती हैं—जैसे कवियों की स्मृतियाँ, वर्जीनिया का मौन, मीरा का विस्मय और अजनबी महिलाओं की अधूरी चिट्ठियां। इस अदृश्य संसार के बीच, कवयित्री अपने विचारों को हर रात धीरे-धीरे खो देती हैं, जैसे कोई ज्योत अपने ही प्रकाश से थक गई हो। अंततः, एक प्रिय व्यक्ति की निस्पंद धड़कनों में मिलने वाला आसरा उसे थके हुए मन को सहारा देने और हृदय का भार साझा करने की अनुभूति कराता है।

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ढूँढें माँ की छाँव

यह कविता गहन भावनाओं और स्मृतियों के माध्यम से माँ और बचपन की छाया की खोज को प्रस्तुत करती है। पहली कविता में माता की ममता और उनके बिना घर की खाली-खाली देहरी की पीड़ा व्यक्त की गई है, जबकि दूसरी कविता में बचपन की नॉस्टैल्जिया और पिता की यादें उजागर हैं। कवि ने मातृत्व, प्रेम और संवेदनशीलता के रसों के साथ भावनाओं की गहराई में जाकर वियोग, याद और आत्मचिंतन का दृश्य खींचा है।

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खुशबू से बंधा पहला प्यार

यह कविता मानो खुशबुओं का एक जीवन वृत्तांत है। हर स्मृति, हर अनुभव एक विशेष सुगंध से जुड़कर अमर हो गया है। पहली बारिश की मिट्टी की महक, प्रियतम की मीठी बातों की महक, किताबों से उठती खुशबू, हाथों में महंदी की गंध, गहनों में समाया पसीना, खिड़की से आती रातरानी की महक और तन पर चंदन की सुगंध—सब कुछ उसके प्रेम और साथ के अनुभवों से गुँथा हुआ है। यह केवल प्रेम की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि उन अदृश्य अनुभूतियों का बयान है जो इंद्रियों से परे जाकर हृदय में स्थायी छाप छोड़ देती हैं। हर खुशबू, एक स्मृति बनकर जीती है और हर स्मृति में प्रेम की गहराई झलकती है।

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प्रेम का संगम

यह कविता गहरे प्रेम और स्मृतियों की शक्ति को दर्शाती है। कवयित्री अपने प्रिय के अस्तित्व को अपनी स्मृतियों और प्रार्थनाओं में जीवित रखती है। उसका प्रेम इतना निष्ठावान है कि उसने किसी उद्देश्य या लक्ष्य की अपेक्षा नहीं की, केवल यह सुनिश्चित किया कि वह अपने प्रिय की खुशी और अस्तित्व का सम्मान करती रहे। कवयित्री अपने प्रेम को एक फल या कर्म के रूप में समर्पित करती है और इसे ईश्वर के माध्यम से पवित्र बनाती है।

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कुछ नजारे ऐसे…

कुछ नज़ारे ऐसे होते हैं जो पूरी ज़िंदगी को समेटे रहते हैं। वे लौटकर फिर कभी नहीं आते, लेकिन जाते हुए भी दिखाई नहीं देते। कभी वे प्रेम-रस से भरे बादलों की तरह मन के भँवर को पागल बना देते हैं, तो कभी यादों के आकाश में उड़ते पंछियों की तरह हमें बीते दिन और रातें लौटा लाने को मजबूर करते हैं।

कुछ नज़ारे आँखों के काजल जैसे होते हैं, जो मन में फूलों की डोली सजा देते हैं और अपनी रंग-बिरंगी खुशबू से जीवन भर को महका जाते हैं। जब वे याद आते हैं, तो चेहरे पर एक मुस्कान ले आते हैं और यह अहसास कराते हैं कि जीवन में कोई प्यारा साथ है, जिसके साथ ज़िंदगी जीने लायक बनती है।

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तुम कितना बदल गए हो

“मैं तो आज भी वैसी ही हूँ, वही यादों और स्नेह में जीती हुई। बदल गए तो सिर्फ तुम—वो नज़रें, वो बातें, वो अपनापन सब पीछे छूट गया। अगर अब मैं बदल भी गई हूँ, तो सवाल मुझसे नहीं, खुद से करना।”

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नमन उन पितरों को, जिनसे है हमारी पहचान

पितृपक्ष केवल स्मरण का पर्व नहीं, बल्कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित रहने वाले संस्कारों और धरोहरों का अनुभव है। पितर कहीं दूर नहीं जाते, वे हर आँगन, हर देहरी और हमारे हावभाव तक में बसे रहते हैं। उनकी दी हुई सीख और आशीष ही हमें जीवनभर संबल देती है और हमारी पहचान को सहेजती है।

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गुज़र जाने के बाद…

तूफ़ान गुजरने के बाद बर्बादी की तस्वीर सामने थी। होश आया तो बस खालीपन और ग़म ही हाथ लगा। मेहंदी का नाम गीतों में मशहूर है, पर दुल्हन की हथेलियों पर उसका रंग तब ही सँवरता है जब वह अपने घर पहुँचती है। ज़िंदगी ने कई ज़ख्म दिए थे, मगर सबसे गहरा घाव तेरे मुकर जाने के बाद ही मिला। डर है कहीं जंगल भी इतिहास न बन जाएं और शजर खो देने पर हमें अपनी भूल पर पछताना न पड़े। अब कनक किससे अपना दिल का हाल कहे—प्यार का नशा तो आता है, पर उसका असर देर से समझ आता है, जब सब कुछ बीत चुका होता है।

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